एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में राष्ट्रीय वन्यजीव सप्ताह के तीसरे दिन छात्र-छात्राओं को दिखाई गई ‘रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस’ फिल्म
–वाइल्ड लाइफ के शौकीन और पर्यावरण से प्रेम करने वाले व्यक्तियों को ‘रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस’ जरुर देखनी चाहिए: डॉ अनुपम अरोड़ा
BOL PANIPAT , 05 अक्टूबर. एसडी पीजी कॉलेज पानीपत के जैव विज्ञान विभाग के तत्वाधान में 2 से 8 अक्टूबर तक मनाये जा रहे राष्ट्रीय वन्य जीव सप्ताह के तीसरे दिन छात्र-छात्राओं को ‘रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस’ फिल्म दिखाई गयी और उन्हें वन्य जीवों के प्रति संवेदनशील बनाया ताकि वे पर्यावरण संरक्षण और वन्य जीवो की सुरक्षा को लेकर गंभीर बने और इसके संरक्षण में मदद करे. बीएससी और अन्य संकायों के छात्र-छात्राओं के साथ डाक्यूमेंट्री का आनंद प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, डॉ राहुल जैन, डॉ रवि कुमार, डॉ प्रियंका चांदना, प्रो प्रवीन कुमारी, प्रो ऋतु, प्रो नम्रता और प्रो रिया ने लिया. प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने बताया कि ‘रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस’ की कहानी एक फोटो-पत्रकार की मौत से शुरू होकर बाघ, जंगल और जिंदगी के संघर्ष से गुजरकर बदले की भावना तक पहुंचती है.

फोटो-पत्रकार उदय रोमांच का बेहद शौकीन व्यक्ति है. वह सुंदरबन के घने जंगलों में अपने एक फोटोग्राफी प्रोजेक्ट को निपटाने मे व्यस्त रहता है कि वह एक दिन शिकारी के जाल में सफेद बाघ के बच्चे को देखता है. उदय इस शिकारी के जाल में फंसे सफेद बाघ के बच्चे को बचाने में कामयाब रहता है. वह शावक को लेकर घर आ जाता है. परन्तु अपने बच्चे की तलाश में बाघिन, शावक की गंध को सूंघते हुए उदय के घर आ जाती है. वह अपने बच्चे को वहां न पाकर उदय को मार कर उसकी लाश लेकर गायब हो जाती है. उदय के मारे जाने की खबर जब उसके भाई पंडित को मिलती है तो वह अपने कुछ दोस्तों के साथ उसी बाघिन को मारने के लिए सुदंरबन आ जाता है. यहां आकर वह अपनी टीम के साथ इस बाघ को ढूंढने में लग जाता है. यहां उसके साथ जंगल में बाघिन खोजने में हुनरमंद झूम्पा भी है जो उसकी टीम को बाघिन तक पहुंचने का रास्ता दिखाती है. परन्तु झूम्पा को मालूम नहीं है कि पंडित और उसकी टीम सुंदबन में बाघिन को मारने के मकसद से आई हुई है. बाघिन अपने बच्चे की तलाश में भटकते हुए पंडित की टीम के सदस्यों पर भी हमला शुरू कर देती है. इसके आगे की कहानी बाघिन से संघर्ष और पंडित की टीम के जंगल से निकलने की कहानी है. सभी पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीवों से लगाव रखने वाले लोगों को यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए. डॉ रवि कुमार ने कहा कि सुंदरबन और इसके टाइगर्स पर पहले भी कई बेहतरीन डॉक्युमेंटरीज बनी हैं जिन्हें हम रोमांच और वाइल्ड लाइफ चैनलों पर देख सकते है. परन्तु आज दिखाई गई फिल्म वाकई में उनसे अलग और रोचक है. ऐसी फिल्में भी हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा ही है.

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