Sunday, October 18, 2026
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न्यूमोकोनियोसिस पीड़ित श्रमिकों को मिलेगी 5 लाख रुपए की पुनर्वास सहायता: उपायुक्त डॉ हरीश कुमार वशिष्ठ

By LALIT SHARMA , in Uncategorized , at October 18, 2026 Tags: , , , , ,

बीमारी से पीड़ित श्रमिकों के इलाज, मुआवजे और परिवार के पुनर्वास के लिए बनाई गई नई नीति

पीड़ित श्रमिक की मृत्यु पर परिवार को एक लाख और अंतिम संस्कार के लिए 15 हजार रुपए की सहायता

बच्चों की पढ़ाई, बेटियों की शादी और परिवार के भरण-पोषण के लिए भी मिलेगी आर्थिक मदद

BOL PANIPAT : 18 अक्टूबर। हरियाणा सरकार ने खतरनाक औद्योगिक परिस्थितियों में काम करने के कारण फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से पीड़ित श्रमिकों और उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए हरियाणा न्यूमोकोनियोसिस पुनर्वास नीति लागू की है। इस नीति का मुख्य उद्देश्य सिलिकोसिस, एस्बेस्टोसिस, बायसिनोसिस और बैगासोसिस जैसी व्यावसायिक बीमारियों से पीड़ित श्रमिकों को इलाज, मुआवजा, पुनर्वास और विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उपलब्ध करवाना है। नीति के तहत पात्र श्रमिक को बीमारी की पुष्टि होने पर एकमुश्त पांच लाख रुपए की पुनर्वास सहायता देने का प्रावधान किया गया है।
उपायुक्त डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ ने कहा कि श्रमिक प्रदेश की आर्थिक प्रगति और औद्योगिक विकास की मजबूत नींव हैं। श्रमिकों के स्वास्थ्य, सम्मान और आर्थिक सुरक्षा की रक्षा करना सरकार की प्राथमिकता है। न्यूमोकोनियोसिस जैसी गंभीर व्यावसायिक बीमारियां श्रमिक के साथ-साथ उसके पूरे परिवार को प्रभावित करती हैं। ऐसे में यह नीति पीड़ित श्रमिकों और उनके आश्रितों को कठिन परिस्थितियों में आर्थिक सहारा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उपायुक्त ने बताया है इस बीमारी के शुरुआती दौर पर पता चल जाने से इस बीमारी के घातक परिणामों से बचा जा सकता है
उपायुक्त डॉ हरीश ने बताया कि पात्र श्रमिकों को योजना की जानकारी उपलब्ध करवाना और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लाभ दिलवाना आवश्यक है, ताकि कोई भी पात्र परिवार सहायता से वंचित न रहे।
उपायुक्त ने बताया कि
नीति के अनुसार, हरियाणा न्यूमोकोनियोसिस डायग्नोसिस बोर्ड द्वारा सिलिकोसिस, एस्बेस्टोसिस, बायसिनोसिस अथवा बैगासोसिस से पीड़ित प्रमाणित किए गए पात्र श्रमिक को एकमुश्त पांच लाख रुपए की पुनर्वास सहायता दी जाएगी। यदि बीमारी से पीड़ित श्रमिक की मृत्यु पुनर्वास सहायता मिलने से पहले हो जाती है, तो नियमानुसार यह सहायता उसके विवाहित होने की स्थिति में विधवा या विधुर को तथा अविवाहित होने की स्थिति में जीवित माता-पिता में से एक को दी जा सकेगी।
उपायुक्त ने बताया कि मृत्यु पर परिवार को आर्थिक सहायता
नीति में पीड़ित श्रमिक की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सहारा देने के लिए अलग-अलग सहायता राशि का प्रावधान है। इसके तहत मृत्यु के बाद एक लाख रुपए की सहायता तथा अंतिम संस्कार के लिए 15 हजार रुपए दिए जाने का प्रावधान किया गया है। मृत्यु के बाद मिलने वाली सहायता पात्र विधवा या विधुर अथवा नियमानुसार नामांकित व्यक्ति को दी जाएगी।
उपायुक्त ने बताया कि अंतिम संस्कार सहायता के लिए मृतक श्रमिक का पहचान पत्र और मृत्यु प्रमाण पत्र आवश्यक होगा।
परिवार के भरण-पोषण और बच्चों की पढ़ाई में मदद
न्यूमोकोनियोसिस से पीड़ित श्रमिक की बीमारी अथवा मृत्यु से प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए नीति में अन्य कल्याणकारी प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
सहायक निदेशक औद्योगिक स्वास्थय डिविज़न, पानीपत के डॉ हरेंद्र मान ने बताया कि इसमें पात्रता के अनुसार 4,000 रुपए प्रतिमाह की सहायता, श्रमिक की बीमारी से मृत्यु होने पर पात्र आश्रितों को 3,500 रुपए प्रतिमाह पारिवारिक पेंशन तथा बच्चों की पढ़ाई के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान किया गया है।
यही नहीं
शिक्षा सहायता के तहत कक्षा और पाठ्यक्रम के अनुसार अलग-अलग राशि निर्धारित की गई है। नीति में कक्षा पहली से दसवीं तक पढ़ने वाले बच्चों के लिए 5,000 रुपए, कक्षा 11वीं और 12वीं के लिए 6,000 रुपए, आईटीआई के लिए 6,000 रुपए, स्नातक के लिए 10,000 रुपये और स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई के लिए 12,000 रुपए की सहायता का उल्लेख है।
यही नहीं पात्र परिवारों को विवाह के अवसर पर भी आर्थिक सहायता दी जाएगी। नीति के अनुसार, बेटियों की शादी के लिए 51,000 रुपए कन्यादान सहायता का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त बेटों की शादी के लिए 11,000 रुपए की वित्तीय सहायता दी जाएगी। इन योजनाओं का लाभ निर्धारित पात्रता और आवश्यक दस्तावेजों के आधार पर मिलेगा।
उन्होंने बताया कि
नीति के तहत बीमारी से पीड़ित श्रमिकों के इलाज की व्यवस्था भी सुनिश्चित की गई है। कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम के तहत पंजीकृत श्रमिकों को ईएसआई अस्पताल में इलाज के लिए भेजा जाएगा। वहीं, इस अधिनियम के तहत पंजीकृत नहीं होने वाले श्रमिकों को सरकारी जिला अस्पतालों अथवा चिकित्सा महाविद्यालयों में जांच, मुफ्त इलाज और दवाइयों की सुविधा उपलब्ध करवाई जाएगी। यदि आवश्यक दवाइयां, जांच या उपकरण स्वास्थ्य विभाग के पास उपलब्ध नहीं होंगे, तो उन्हें बाजार से खरीदने और उसकी राशि की श्रम विभाग से प्रतिपूर्ति करने का प्रावधान भी किया गया है।
उन्होंने बताया कि
मुआवजे के मामले में ईएसआई के तहत पंजीकृत श्रमिकों को संबंधित अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार लाभ मिलेगा, जबकि अपंजीकृत श्रमिकों को कामगार क्षतिपूर्ति अधिनियम के तहत मुआवजा दिया जाएगा।
उन्होंने बताया कि
पात्र श्रमिकों को कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए निर्धारित आवेदन पत्र भरकर अपने क्षेत्र के सहायक निदेशक, औद्योगिक स्वास्थ्य, श्रम विभाग पानीपत के कार्यालय में जमा करवाना होगा। आवेदन की जांच के बाद इसे श्रम आयुक्त-सह-कल्याण आयुक्त कार्यालय को भेजा जाएगा। आवेदन पत्र हरियाणा श्रम विभाग की वेबसाइट hrylabour.gov.in पर उपलब्ध होने का उल्लेख नीति में किया गया है।
इन बीमारियों के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई जाएगी।
डॉ मान ने बताया कि
न्यूमो कोनियोसिस के अंतर्गत आने वाली बीमारियां मुख्य रूप से कार्यस्थलों पर धूल और हानिकारक रेशों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से होती हैं। इनमें सिलिका धूल, एस्बेस्टस फाइबर, कपास की धूल और गन्ने की खोई से संबंधित धूल के संपर्क से होने वाली बीमारियां शामिल हैं। इनके कारण सांस लेने में परेशानी, खांसी, सीने में दर्द और फेफड़ों में स्थाई नुकसान हो सकता है।
नीति में श्रमिकों को इन बीमारियों के लक्षणों, समय पर जांच और बचाव के उपायों के प्रति जागरूक करने के लिए नियमित कार्यक्रम आयोजित करने का प्रावधान भी किया गया है।
उपायुक्त डॉ हरीश कुमार वशिष्ठ ने बताया कि इसके लिए स्वास्थ्य विभाग, ईएसआई अस्पतालों, चिकित्सा महाविद्यालयों, गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे।

लक्षण
आम तौर पर टी बी या छय रोग वाले लक्षण होते हैं,⁠ साँस लेने में तकलीफ़, थकान, भूख न लगना, छाती में दर्द, सुखी खाँसी, अंतत फेफड़ों मे फाइब्रोसिस हो जाती है।

बचाव
फैक्ट्री मालिकों ने मशीनों को दुरुस्त रखना चाहिए ताकि वो कम धूल पैदा करे|
सभी मज़दूरों को मास्क पहन कर काम करना चाहिए |
सफ़ाई करते समय थोड़ा पानी का छिड़काव करना चाहिए ताकि धूल हवा में उड़कर साँस के ज़रिए फेफड़ों में नए जाए।
कार्यस्थल हवादार होना चाहिए ताकि धूल कार्यस्थल से बाहर जा सके।
मजदूरो को जो ऐसी धूल में काम करते हैं उन्हें तीन साल मे उनकी छाती का एक्स-रे करवा कर स्पेशलिस्ट को जरूर दिखाना चाहिए।

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