पराली नहीं, खेत की ताकत समझें किसान. खेत में आग लगाने के बजाय अवशेष प्रबंधन अपनाएं: उपायुक्त डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ
पराली से धुआं नहीं, मिट्टी में लौटाएं पोषक तत्व; किसान तकनीक अपनाकर बढ़ाएं आमदनी और बचाएं पानी
फसल अवशेष प्रबंधन से मिट्टी की सेहत, भूजल और पर्यावरण तीनों का संरक्षण संभव
पराली जलाने की घटनाओं में आई बड़ी कमी, किसानों की भागीदारी से बनेगा ‘पराली एक पूंजी’ का मॉडल
BOL PANIPAT , 24 सितंबर। जिला उपायुक्त डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ ने किसानों से अपील की है कि वे धान की पराली को बेकार समझकर खेतों में आग न लगाएं, बल्कि इसे खेत की उर्वरता, मिट्टी की सेहत और अतिरिक्त आमदनी का साधन बनाएं। अवशेष जलाने से कुछ समय के लिए खेत साफ हो जाता है, लेकिन इसके दूरगामी नुकसान मिट्टी, पर्यावरण, भूजल और मानव स्वास्थ्य पर पड़ते हैं। इसके विपरीत आधुनिक कृषि तकनीकों और फसल अवशेष प्रबंधन के माध्यम से पराली को खेत में ही उपयोग किया जा सकता है या विभिन्न उपयोगों के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है।
उपायुक्त ने कहा कि धान की कटाई के बाद खेत में बची पराली में कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर सहित अनेक पोषक तत्व मौजूद होते हैं। खेत में आग लगाने से ये पोषक तत्व नष्ट होने के साथ-साथ धुआं और प्रदूषक तत्व वातावरण में फैलते हैं। इसलिए किसान पराली को जलाने के बजाय इसे मिट्टी में मिलाने, मल्चिंग करने अथवा बेल बनाकर विभिन्न उपयोगों के लिए देने जैसे विकल्प अपनाएं। उपायुक्त ने कहा कि पराली प्रबंधन केवल प्रदूषण रोकने का विषय नहीं है, बल्कि यह खेती की लागत कम करने, मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने और आने वाली फसलों के लिए भूमि को बेहतर बनाने से भी जुड़ा है।
उपायुक्त ने बताया कि हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, स्ट्रॉ मल्चर, बेलर जैसी मशीनों के माध्यम से किसान धान के अवशेष का उपयोग करते हुए गेहूं की बुवाई कर सकते हैं। इससे खेत तैयार करने में लगने वाला समय और श्रम कम होता है तथा मिट्टी में नमी बनाए रखने में भी मदद मिलती है। डॉ. वशिष्ठ ने कहा कि फसल अवशेषों को केवल खेत में उपयोग करने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। पराली से बायोमास, बायो-सीएनजी, जैव ईंधन, कागज व पैकेजिंग सामग्री, बायोचार तथा अन्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
उपायुक्त ने कहा है कि जो अवशेष आज किसान के लिए समस्या दिखाई देता है, वही उचित प्रबंधन से आय और रोजगार का माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि भूजल संरक्षण भी फसल चक्र और पराली प्रबंधन से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। धान की खेती में भूजल की आवश्यकता को देखते हुए फसल अवशेष प्रबंधन के साथ-साथ ऐसी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना जरूरी है, जो प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम करें। खेत में अवशेष मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ और नमी संरक्षण में मदद मिलती है, जिससे भूमि की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।
उपायुक्त ने बताया कि जिले में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को कम करने के लिए निगरानी, जागरूकता, मशीनरी की उपलब्धता और प्रशासनिक स्तर पर लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। गांवों को आग की घटनाओं के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में चिन्हित कर निगरानी की जा सकती है तथा रेड और येलो श्रेणी वाले गांवों में विशेष जागरूकता एवं फसल अवशेष प्रबंधन गतिविधियों को बढ़ाया जा सकता है।
डॉ. वशिष्ठ ने किसानों से अपील की कि वे पराली को आग लगाने के बजाय उसे ‘पराली एक पूंजी’ की सोच के साथ देखें। उन्होंने कहा कि किसानों की जागरूकता और सक्रिय भागीदारी से खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सकता है, भूजल संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकता है और वायु प्रदूषण को कम करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है। उन्होंने संबंधित विभागों को भी निर्देश दिए कि किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन की आधुनिक तकनीकों, उपलब्ध मशीनरी और इसके आर्थिक लाभों के बारे में लगातार जागरूक किया जाए।

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