एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में ‘कला और सोशल साइंस में समकालीन रुझान’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस का सारगर्भित समापन
अन्तर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने भाग लेकर कांफ्रेंस को लगाए चार चाँद
समाज में हो रहे बदलावों को कला और सामाजिक विज्ञान ही नियंत्रित करते हैं: प्रो संध्या रोहल पुनिया विधि विभाग बीपीएसएम विश्वविधालय खानपुर कलां
सैदव दूसरों की भलाई करने के लिए तत्पर रहने से बड़ा कोई तप नहीं: डॉ बाल किशन शर्मा
ज्ञान, कौशल विकास और नजरिये का निर्माण है नई शिक्षा नीति के आधार स्तम्भ: डॉ प्रेरणा डावर
उच्चतर शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित कांफ्रेंस में देश-विदेश के विभिन्न राज्यों से आये 600 से अधिक प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा
BOL PANIPAT , 19 मार्च. एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में उच्चतर शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस का सारगर्भित समापन हुआ. दुसरे दिन बतौर मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि प्रो संध्या रोहल पुनिया विधि विभाग भगत फूल सिंह महिला विश्वविधालय खानपुर कलां (सोनीपत), डॉ बाल किशन शर्मा जनकवि फौजी मेहर चंद पुरस्कार से अलंकृत एवं पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग और डॉ प्रेरणा डावर निदेशक गीता इंस्टिट्यूट ऑफ़ लॉ करहंस (पानीपत) ने कांफ्रेंस में शिरकत की और अपने ज्ञान का लाभ प्रतिभागियों को दिया. डॉ बाल किशन शर्मा ने ’मानवीय मूल्यों की स्थापना में हिंदी की भूमिका’ और डॉ प्रेरणा दावर ने ‘21वीं शताब्दी में शिक्षा का भविष्य’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया. माननीय मेहमानों का स्वागत कांफ्रेंस के संरक्षक एसडी पीजी कॉलेज प्रधान पवन गोयल, संयोजक एवं कॉलेज प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने पुष्प रोपित गमलें और शाल भेंट करके किया. मंच संचालन प्रो अन्नू आहूजा, डॉ दीपिका अरोड़ा और प्रो हिमानी नारंग ने किया. अंतिम सत्र में सभी प्रतिभागियों को सर्टिफिकेट्स वितरित किये गए. दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस की सबसे ख़ास बात यह रही कि इसमें देश के विभिन्न राज्यों के अलावा अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शोधकर्ताओं ने भी अपने शोध पत्र भेजे. दो दिवसीय कार्यशाला की विस्तृत रिपोर्ट प्रो हिमानी नारंग ने पेश की.
कांफ्रेंस में एम्बेसी कॉलेज बीजिंग (चीन) से फैज़ा अज़ीज़, रोमानिया से राडू इजाबेला डेनियल ने ‘संज्ञानात्मक भाषा विज्ञान’ के अलावा ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, भूटान, बांगलादेश आदि देशों से भी शोध पत्र प्राप्त हुए. रामजस कॉलेज दिल्ली विश्वविधालय से तन्वी पुनिया ने अंग्रेजी विषय पर, श्रीनगर (जम्मू और कश्मीर) से आफिया शिरिन ने जुम्पा लाहिरी पर, डॉ सतिन्द्र कुमार वर्मा एसडी पीजी कॉलेज (लाहौर) अम्बाला कैंट ने ऑस्ट्रेलिया के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार पैट्रिक वाइट पर, प्रो संजीव कुमार राजकीय महाविधालय नारायणगढ अम्बाला ने आलोचनात्मक सिद्धांतो विषय पर, डॉ अर्पित गुप्ता क्वांटम यूनिवर्सिटी रूडकी (उत्तराखंड) ने वाणिज्य विषय पर, सचिन डॉ भीमराव अम्बेडकर यूनिवर्सिटी आगरा (उत्तर प्रदेश) ने शारीरिक शिक्षा विषय पर, डॉ सुरेश कुमार श्याम लाल कॉलेज दिल्ली विश्वविधालय ने वाणिज्य पर, डॉ सकलजंग केन्द्रीय विश्वविधालय भटिंडा (पंजाब) ने इतिहास विषय पर, डॉ एसएस यादव बीकेडी कॉलेज लातूर (महाराष्ट्र) ने प्रबंधन पर, बन्दना देवी राजकीय महाविधालय मंडी (हिमाचल प्रदेश) ने भूगोल पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये.
प्रो संध्या रोहल पुनिया विधि विभाग भगत फूल सिंह महिला विश्वविधालय खानपुर कलां (सोनीपत) ने अपने व्याख्यान में कहा कि एक अच्छे प्राध्यापक का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह खुद को हमेशा एक विद्यार्थी और सीखने वाला मानता है. मानवाधिकार और मानव सम्मान आज के समय की सबसे बड़ी जरुरत है और इसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषयों पर है. सामाजिक विज्ञान के माध्यम से सामाजिक परिप्रेक्ष्य में हो रहे बदलावों को नियंत्रित किया जाता हैं. मानविकी और ऐसे अन्य विषय समाज की संरचना को समझने में हमारी मदद करते है. ये शिक्षा के आधार का निर्माण करने में भी सहायक होते हैं. समाज की समस्याओं का पता लगाना और फिर उन समस्त समस्याओं का समाधान निकालना भी इन्ही विषयों के माध्यम से संभव है. इंसान के पूर्व को वर्तमान एवं वर्तमान को भविष्य के साथ जोड़ने का कार्य सामाजिक विज्ञान के विषय करते है. जी20 के बारे में बोलते हुए उन्होनें कहा कि वैश्विक चुनौतियों का सामूहिक रूप से निराकरण करने के लिए ही जी20 का गठन किया गया है. इस कार्य के लिए सटीक डाटा एकत्रित करने का कार्य सामाजिक विज्ञान के विद्वानों को ही करना है. समाज को बनाने का कार्य सामाजिक विज्ञान के वैज्ञानिकों को ही करना है.
डॉ बाल किशन शर्मा पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग ने ’मानवीय मूल्यों की स्थापना में हिंदी की भूमिका’ विषय पर बोलते हुए कहा कि इंसान जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उद्देश्यों को लेकर पैदा होता है और हमें इन सभी भूमिकाओं को ईमानदारी के साथ निभाना चाहिए. भारतीय परंपरा ज्ञान और मानवीय मूल्यों की सर्वोपरिता पर बल देती है. गीता का कथन है ‘नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते’ अर्थात ज्ञान से बढ़कर मन, वचन और कर्म को पवित्र करने वाला कोई दूसरा तत्व नहीं है. ज्ञानार्जन के माध्यम से ही मानव व्यक्तित्व का निर्माण संभव होता है जो बाद में परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व जीवन में प्रतिबिंबित होता है. सच्ची शिक्षा मनुष्य को अंतरबाह्य बंधनों से मुक्त करती है. संकीर्ण दृष्टिकोण को त्यागकर व्यक्ति का दायरा बढ़ने लगता है और उसे सारा संसार एक परिवार जैसा दिखाई देने लगता है. ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश यही है जो सुदूर अतीत से वर्तमान तक भारतीय संस्कृति का प्रादर्श बना हुआ है. हमें जीवन में दया, भलाई और परोपकार के गुण खुद में पैदा करने चाहिए. सदा दूसरों के लिए अच्छा करना ही सच्चा तप है. सूरदास और कबीर जैसे व्यक्ति ने काव्य को जनसाधारण के मध्य पहुंचाया. यही हर मानविकी और सामाजिक विज्ञान के शोधार्थी का लक्ष्य होना चाहिए. जीवन को कुरीतियों और समस्याओं से मुक्त करने के लिए इन विषयों का पढाया जाना नितांत आवश्यक है.

डॉ प्रेरणा डावर निदेशक गीता इंस्टिट्यूट ऑफ़ लॉ करहंस (पानीपत) ने ‘21वीं शताब्दी में शिक्षा का भविष्य’ पर बोलते हुए कहा कि ज्ञान, कौशल विकास और नजरिये का विकास नई शिक्षा नीति के आधार स्तम्भ है. 21वीं सदी जहाँ अपने साथ तकनीक और प्रौद्योगिकी के विकास को लायी है वहीं इसका प्रभाव वर्तमान शिक्षा पर भी देखने को मिल रहा है. अब शिक्षक शिक्षा को तकनीक और प्रौद्योगिकों से जोड़ने की ओर अग्रसर हैं. वैश्वीकरण के इस दौर में 21वीं सदी की शिक्षा सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित शिक्षा है और यह बात स्कूल की कक्षा से लेकर कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी के हर क्षेत्र तक जाती है. 21वीं सदी की शिक्षा का मुख्य लक्ष्य विश्व-स्तरीय शिक्षा को स्थापित करना है और इसी उद्देश्य से भारत में भी नई शिक्षा निति का निर्माण किया गया है. यह शिक्षण केवल एक विषय के ज्ञान पर नहीं बल्कि अन्य विषयों के ज्ञान पर भी आधारित है. 21वीं सदी में एक शिक्षक के लिए आवश्यक है कि वो शिक्षण में होने वाले हर बदलाव के लिए सैदेव तैयार रहे. कंप्यूटर के इस युग में विद्यार्थियों को केवल एक ही नहीं बल्कि कई तरह के कौशल हासिल करने चाहीये और ऐसा तभी संभव है जब शिक्षक भी स्वयं को कौशलों से युक्त करे.
प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि ‘मानविकी और सोशल साइंस में समकालीन रुझान’ विषय के कितने ही आयामों को इस कांफ्रेंस में उठाया गया और कई नए विचार आम आदमी से लेकर निति निर्धारकों के लिए सुझाए गए. यही इस कांफ्रेंस की सार्थकता रही. इस कांफ्रेंस ने रिसर्च स्कोलर्ज को सोचने और शोध करने के लिए कितने ही विचार दिए है. उन्हें पूरी उम्मीद है की कांफ्रेंस में भाग लेनें वाले प्रतिभागीयो ने व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया है और अब वे इस ज्ञान को दूसरो तक बेहतर ढंग से पहुचाएंगे. विज्ञान और मानविकी को मानवता को बचाने के लिए आपस में सामंजस्य स्थापित करना चाहिए. इस कांफ्रेंस ने इन्सान और इंसानियत को एक नई दिशा दिखाई है.
पवन गोयल प्रधान ने कांफ्रेंस के विषय को सार्थक बताते हुए इसमें भाग लेने वाले विद्वानों, शोधकर्ताओं और छात्र-छात्राओं की प्रसंशा की. उन्होनें कहा कि देश के लिए नीतियाँ और क़ानून बनाना सरकार का कार्य है परन्तु सरकार यह भी चाहती है की नीति-निर्धारण में उसके पढ़े-लिखे नागरिक भी अपने विचार और अनुभव उनके साथ साझा करे. इस तरह की कांफ्रेंस को आयोजित करने का यही ध्येय है और कांफ्रेंस इस मामले में सफल साबित हुई है.
दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस के सह-संयोजक प्रो अन्नू आहूजा और डॉ एसके वर्मा तथा इसके संगठन सचिव डॉ राकेश गर्ग और डॉ सुशीला बेनीवाल रहे. इनके साथ परामर्श समिति में डॉ नवीन गोयल, प्रो प्रवीण खेरडे, प्रो पवन सिंगला, प्रो गीता प्रुथी, डॉ संगीता गुप्ता, डॉ इंदु बाला, प्रो सविता पुनिया और डॉ भारती गुप्ता ने कांफ्रेंस में योगदान दिया. पंजीकरण का दायित्व प्रो डेनसन डी पॉल, प्रो मनोज कुमार, प्रो आशीष गर्ग, प्रो सोनिका, प्रो विशाल गर्ग, प्रो एकता दुरेजा ने निभाया. दो दिविसीय नेशनल कांफ्रेंस में समाजशास्त्र, विधि और राजनीति, जन संचार, मनोविज्ञान, शिक्षा, इतिहास, कला और ललित कला, भूगोल, वाणिज्य, प्रबंधन और सूचना प्रौद्योगिकी, अंग्रेजी भाषा और साहित्य, अर्थ शास्त्र और शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन और विचार-विमर्श किया गया जिसमे प्रदेश और देश के अलग-अलग राज्यों के 600 से अधिक शोधकर्ताओं और प्रतिभागीयों ने भाग लिया और अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये.

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