स्वस्थ और शिक्षित महिलाएं है देश के विकास का सही पैमाना: डॉ अनुपम अरोड़ा
एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में कुरुक्षेत्र विश्वविधालय सात दिवसीय विशेष कैंप का पांचवा दिन
अत्यधिक मोबाइल की लत, युवाओं की सेहत को कर रही पस्त: डॉ राकेश गर्ग,प्रोग्राम ऑफिसर
स्वयंसेवकों ने खेतों में पराली न जलाने का रैली के माध्यम से किया आह्वान
BOL PANIPAT : 05 मार्च, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में कुरुक्षेत्र विश्विधालय कुरुक्षेत्र के एनएसएस पाठ्यक्रम के अनुसार जारी सात दिवसीय विशेष एनएसएस शिविर का पांचवा दिन रहा जिसमें एनएसएस स्वयंसेवकों ने गाँव काबड़ी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाकर वहां उपस्थित बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को अच्छी सेहत होने के फायदे गिनाये और उन्हें कुपोषण से बचने के तरीके सुझाए. उन्होनें संतुलित भोजन, नशे के दुष्प्रभाव और दूषित जल पीने से होने वाली बीमारियों पर भी ग्रामीणों से चर्चा की. तत्पश्चात स्वयंसेवकों ने गाँव में रैली निकाल कर खेतों में पराली न जलाने का जागरूकता अभियान चलाया. अपने सन्देश में उन्होनें पराली जलाने से खेत और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को स्थाई बताया, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती है. एनएसएस कार्यकर्ताओं को प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा के मार्गदर्शन में तथा कॉलेज में एनएसएस एवं वाईआरसी प्रभारी डॉ राकेश गर्ग, डॉ संतोष कुमारी और डॉ एसके वर्मा की अगुआई में ग्राम काबड़ी के लिए रवाना किया गया. डॉ राकेश गर्ग ने ग्राम काबड़ी के युवाओं से मोबाइल की लत पर बातचीत की और उन्हें इसके अत्यधिक प्रयोग से बचने की नसीहत दी. सांयकालीन सत्र में सांस्कृतिक गतिविधियाँ पेश की गई. स्वयंसेवकों ने खुद की मेहनत से बने लज़ीज़ एवं पौष्टिक भोजन का भी आनंद लिया. प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ग्राम काबड़ी में एनएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा जागरूकता अभियान चलाने के प्रयासों की सराहना की. उन्होनें कहा कि देश के विकास का सबसे अच्छा मानक हमारे देश की महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा है. जब तक महिलाएं तंदुरस्त और शिक्षित नहीं होंगी कोई भी परिवार खुशहाल नहीं होगा. उन्होनें कहा कि एनएसएस स्वयंसेवक बहुत अच्छे और पुनीत कार्य कर रहे हैं. युवा अवस्था में अच्छे कार्य करने की क्षमता वैसे भी ज्यादा होती है. कॉलेज के सभी स्वयंसेवी युवा हैं और वे समाज के सबसे गतिशील एवं उर्जावान वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं. उन्हें खुद पर नाज़ होना चाहिए कि वे दूसरों के लिए मिसाल है.

डॉ राकेश गर्ग प्रोग्राम ऑफिसर ने ‘युवाओं में मोबाइल की लत और इसके कुप्रभाव’ पर बोलते हुए कहा कि विकास और प्रौध्योगिकी के इस आधुनिक युग में मोबाइल मानव जीवन का एक अहम हिस्सा बन गया है. एक पल के लिए भी कोई इसे खुद से दूर नहीं करना चाहता है. इसी का नतीजा है कि माता-पिता की देखा-देखी में छोटे बच्चे भी इसके आदी हो गए हैं. माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य लाड़-प्यार के कारण अपने बच्चों की जिदगी में इंटरनेट मीडिया को दाखिल कर रहे है. इसके कारण शारीरिक और मानसिक समस्याओं के साथ-साथ बच्चे संस्कारों से भी दूर हो रहे हैं. इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब आदि अन्य एप जहां दुनियाभर में जागृति फैला रहे है वहीं इन पर गलत सामग्री भी पोस्ट हो रही जिससे हमारे बच्चे बिगड़-भटक रहे है. इससे हमारी आँखें भी खराब हो रही है. मोबाइल के अधिक इस्तेमाल से आंखों में सूखापन और इनकी मांस-पेशियां कमजोर हो जाती है. इससे सिरदर्द और आंखों में थकान होने लगती है. हमें लगातार 20 मिनट से ज्यादा मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. मोबाइल के इस्तेमाल से ही बच्चों में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है. उन्हें समय से नींद नहीं आती और उनके शारीरिक विकास में रुकावट पैदा हो जाती है. अपरिपक्व उम्र में बच्चों को मोबाइल देना किसी भी मायने में सही नहीं है. हमारे बच्चे मोबाइल के अधिक प्रयोग से शारीरिक रूप से कमजोर हो और संस्कारों से अनभिज्ञ होते जा रहे हैं. उनमें नैतिकता के पतन का एक कारण मोबाइल ही है.

डॉ एसके वर्मा ने कहा कि धान और गेहूं की कटाई के बाद लोग खेतों को जल्दी खाली करके दूसरी फसल रोपने के चलते खेतों में ही पराली और अन्य कूड़े को जला देते हैं. इस पराली को जलाने से भूमि को बहुत क्षति पहुंचती है. इससे खेतों के आसपास के वातावरण का तापमान बहुत बढ़ जाता है तथा पानी सूख जाने के कारण फसल के लिए पानी की आवश्यकता भी बढ़ जाती है. खेतों में मौजूद भूमिगत कृषि मित्र कीट तथा अन्य सूक्ष्म-मित्र जीव आग की तपिश से मर जाते हैं और शत्रु कीटों का प्रकोप बढ़ जाने के कारण नई बोई गई फसलों को तरह-तरह की बीमारियां घेर लेती हैं. इसके
परिणामस्वरूप भूमि की उर्वरता कम हो जाती है तथा उत्पादन घट जाता है. इससे निपटने के उपाय सुझाते हुए उन्होनें कहा कि जलाने की बजाय किसान सीधी बिजाई का तरीका अपना सकते हैं. वे पिछली फसल की खड़ी पराली के बीच ही अगली फसल रोप सकते है और सूखी हुई खड़ी फसल धीरे-धीरे खाद में बदल कर फायदेमंद साबित होती है. उन्होनें कहा कि हमें पर्यावरण से स्नेह का रिश्ता बनाकर रखना चाहिए वरना इसके दुष्परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को झेलने होंगे.

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