-1857 का संग्राम-हरियाणा के वीरों के नाम नाटक मंचन से युवाओं ने जानी शहीदों की वीर गाथा
-सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग द्वारा आर्य कॉलेज के सभागार में हुआ नाटक मंचन
-लोकसभा सांसद संजय भाटिया ने दीप प्रजवलित कर किया शुभारम्भ
-कलाकारों ने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म और हरियाणा के वीरों की वीरता का किया प्रस्तुतिकरण
BOL PANIPAT, 27 सितम्बर। आजादी के अमृत महोत्सव की श्रृंखला में सूचना, जनसंपर्क एवं भाषा विभाग द्वारा स्थानीय आर्य कॉलेज सभागार में 1857 का संग्राम-हरियाणा के वीरों के नाम’ नाटक का मंचन किया गया। नाटक मंचन से युवाओं ने हरियाणा के वीर शहीदों की वीर गाथा को जाना। चंडीगढ़ से आए कलाकारों ने देश की आजादी के लिए शुरु किए गए 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा के वीरों की भूमिका का प्रभावशाली रूपांतरण किया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अहम योगदान देने वाले सदरूदीन मेवाती पर एक गीत प्रस्तुत किया, जिसके बोल थे कि मैं सदरूदीन किसान का बेटा-माहिर सूं फसल ऊगावण मं, देश की खातिर जंग लड़ी थी 1857 मं। कलाकारों ने अपने अभिनय से दर्शकों की बार-बार तालियां बटौरी। उपायुक्त सुशील सारवान ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। इस मौके पर जजपा के जिला अध्यक्ष सुरेश काला, आर्य कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. जगदीश गुप्ता भी मुख्य रूप से उपस्थित रहे।
सांसद संजय भाटिया ने नाटक मंचन की प्रशंसा करते हुए कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव की श्रृंखला में सरकार द्वारा इन कार्यक्रमों के माध्यम से महान स्वतंत्रता सेनानियों को नमन किया जा रहा है। इसके साथ-साथ इन कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य युवा पीढ़ी को अमर वीर शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन संघर्ष से अगवत करवाना है, ताकि वे उनके जीवन से प्रेरणा ले सकें। उपायुक्त सुशील सारवान ने कहा कि देश की आजादी के लिए कुर्बान होने वाले महान स्वतंत्रता सेनानियों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। इसके लिए विशेषकर युवाओं में देश भक्ति की भावना का होना जरूरी है।
नाटक में अपने अभिनय के माध्यम से कलाकारों ने दर्शाया कि अंग्रेजी हकुमत ने हमारे ऊपर असहनीय जुल्म किए। न केवल हरियाणा बल्कि पूरा हिंदुस्तान उनके जुल्म की आग में झुलसा। आजादी के लिए लाखों लोगों ने अपनी कुर्बानी दी। देश की आजादी के लिए शुरु किए 1857 के संग्राम की शुरुआत अंबाला से 10 मई से हुई। इस क्षेत्र के वीर जवानों ने अंग्रेजी सेना के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया। नाटक के माध्यम से दिखाया गया कि अंबाला की छावनी नंबर नौ और छावनी नंबर 60वीं ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे पहले मुखालफत की और लड़ाई शुरु की। कलाकारों ने बताया कि विवशता के चलते अंग्रेजी सेना में शामिल हुए हमारे सैनिक भी आखिरकार तत्कालीन अंग्रेजी सेना के खिलाफ हुए और सैनिक बहादुर ने अंग्रेजी सेनापति की गोली मारकर हत्या की। इस जांबाज सैनिक ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने की बजाय अपने आप को स्वयं ही गोली मारना मुनासिफ समझा।

नाटक के दौरान छाया रहा राव तुलाराम व सदरूदीन मेवाती का अभिनय:
नाटक के दौरान 1857 के संग्राम में अहम योगदान देने वाले सदरूदीन मेवाती और राव तुलाराम का अभिनय छाया रहा। नाटक के माध्यम से कलाकारों ने दर्शाया कि रेवाड़ी के राजा राव तुलाराम, बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह, बहादुरगढ़ के राजा जंग बहादुर, हिसार के नवाब मोहम्मद अजीम ने आपस में मिलकर अंग्रेजी कंपनी हुकूमत के खिलाफ बगावत करने का फैसला लिया। सदरूदीन ने अपने गांव व आसपास क्षेत्र के लोगों को अपने साथ जोडकऱ अंग्रेजों के खिलाफ पूरी फौज खड़ी की। उसकी बहादुरी के चलते राव तुलाराम ने सदरूदीन को अपनी सेना का सेनापति बनाया। सदरूदीन ने अंबाला छावनी के सिपाहियों को प्रीति भोज दिया और एक गीत के माध्यम से बताया कि रोटी बांटी गुड़ की डली और प्रेम का भोज लगाया, गांव-समाज की मां-बहनों ने लंगर आप बनाया। कलाकारों ने बताया कि अंबाला में पहली शहादत क्रांतिकारी मोहर सिंह ने दी, जिनको अंग्रेजों ने फांसी पर लटकाया था। कलाकारों ने बताया कि देश की आजादी के लिए पूरे हरियाणा के वीरों ने अंग्रेजों के साथ लड़ाई लड़ी और अपनी वीरता का परिचय दिया। यह पूरा नाटक हरियाणा वासियों के कठोर संघर्ष की दास्तान को बयान करता है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए शुरू किए गए प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान दिया। नाटक का रूपांतरण चाईनीज गिल व उसकी पार्टी ने किया जिनमें जसवीर कुमार, प्रगति शर्मा, विवेक शर्मा, अरुण चहल, प्रदीप गिरी, सुरेन्द्र नरूला, राज कटारिया, अभिमन्यु, अकुंश व विक्की ने शानदार अभिन्य की प्रस्तुति दी। संगीत निर्देशक माजिद खान के साथ प्रदीप निर्बान और मदन कुमार के साथ अभिषेक शर्मा भी उपस्थित रहे। यह नाटक डॉ. चन्द्रशेखर द्वारा लिखा गया जिसमें गीतकार की भूमिका विनोद भारती की रही।

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