बुद्धि वाला व्यक्ति स्वयं प्रसन्न रहता है और दूसरों को प्रसन्न रखता है : स्वामी दयानन्द सरस्वती
BOL PANIPAT : श्री संत द्वारा हरि मन्दिर, निकट सेठी चौक, पानीपत के प्रांगण में नव विक्रमी सम्वत 2081 के उपलक्ष्य के अवसर पर परम पूज्य 1008 स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज (मुरथल वाले) की अध्यक्षता में सप्ताह भर चलने वाले संत समागम कार्यक्रम के सातवें दिन महाराज श्री ने प्रवचन करते हुए कहा कि सम बुद्धि वाला व्यक्ति स्वयं प्रसन्न रहता है और दूसरों को प्रसन्न रखता है। आप जितना प्रसन्न रहेंगे उतना स्वस्थ रहेंगे। आत्मा परमात्मा का बोध ज्ञान में जरूरी है। शरीर नींव है, आत्मा शिखर है। नींव का पत्थर दिखाई नहीं पड़ता लेकिन कलश सबको दिखाई पड़ता हैं यदि नींव निकाल दो तो शिखर गिर जाएगा। यदि शरीर स्वस्थ हो तो आत्मा रूप कलश का दर्शन जरूर होगा। व्यक्ति तभी स्वस्थ रहता है जब जीवन में समता आ जाए। समता वाला व्यक्ति झुकना जानता है। तीव्र बुद्धि वाला व्यक्ति नहीं झुकना चाहता। एक राजकुमार भोगी था। एक दिन उसने भगवान बुद्ध का प्रवचन सुना। इससे अल्प बुद्धि समाप्त हुई। वो भोग का त्याग कर जमीन पर सोने लगा। जब महात्मा बुद्ध को पता चला तो उन्होंने राजकुमार को कहा कि तुम्हें आत्मबोध नहीं हो सकता। क्योंकि तुम पहले भी अति भोगी जीवन जी रहे थे और अब अति त्यागी जीवन जी रहे हो। लेकिन जीवन समता का नाम है इसमें अति नहीं होना चाहिए। इससे पूर्व स. गुरविन्द्र शाह सिंह महाराज जी ने कहा कि अगर जीवन में गुण न हो तो भक्ति नहीं हो सकती। गुण धारण करने पड़ेंगे, गुण सीखने पड़ेंगे। हमारे अंदर बहुत अवगुण हैं। हम जीवन में बहुत पाप करते हैं। लेकिन अंतकाल में धर्मराज के आगे हमें उसका हिसाब देना पड़ेगा। इसलिए हमें पाप से बचना चाहिए। इस अवसर पर रमेश चुघ प्रधान, हरनाम चुघ, उत्तम आहूजा, किशोर रामदेव, दर्शन रामदेव, कर्म सिंह रामदेव, अमरजीत सपड़ा, ओमप्रकाश खुराना, करतार चुघ, महेन्द्र चुघ, ओमी चुघ, अमन रामदेव, श्याम लाल सपड़ा, सोनू खुराना, गोपी मेंहदीरत्ता, आत्म खुराना, जगदीश जुनेजा, राघव चुघ, लव्वी जुनेजा सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

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