विश्व विज्ञान के मस्तक पर चमकता हुआ सितारा है भारतीय विज्ञान: डॉ अनुपम अरोड़ा
एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में तीन दिवसीय राज्य स्तरीय राष्ट्रीय विज्ञान दिवस कार्यक्रमों का सारगर्भित समापन
रमन इफेक्ट की खोज करने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता सीवी रमन की याद में रमन मेमोरियल लेक्चर का आयोजन
BOL PANIPAT , 28 फरवरी. एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में आयोजित तीन दिवसीय राज्य स्तरीय राष्ट्रीय विज्ञान दिवस कार्यक्रमों का सारगर्भित समापन हो गया. अंतिम दिन विभिन्न ख्याति प्राप्त भारतीय वैज्ञानिकों को याद करने हेतू रमन मेमोरियल लेक्चर का आयोजन किया गया जिसे भौतिकी विषय के ख्याति प्राप्त प्राध्यापक और कॉलेज के अनुभवी प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने दिया और प्रतिभागियों के ज्ञान में वृद्दि की. प्राचार्य ने एमएससी (भौतिकी), एमएससी (रसायन शास्त्र) एवं बीएससी के छात्र-छात्राओं से बातचीत भी की और उनसे उनके पाठ्यक्रम और भविष्य की योजनाओं के बारे में चर्चा की. इस अवसर पर तीन दिवसीय आयोजन के सूत्रधार प्रो राकेश कुमार सिंगला, प्रो मुकेश गुप्ता और डॉ प्रवीन कत्याल, डॉ रवि कुमार, डॉ राहुल जैन, डॉ प्रियंका चांदना, प्रो प्रवीण कुमारी, डॉ चेतना नरूला, डॉ रेणु गुप्ता, डॉ बिंदु रानी, प्रो साक्षी, प्रो अरुण सैनी, प्रो मोहित सैनी व्याख्यान का हिस्सा रहे. विदित रहे कि वर्ष 1928 में भारतीय भौतिक विज्ञानी सर चन्द्रशेखर वेंकट रमन के द्वारा रमन प्रभाव के आविष्कार को याद करने के लिये हर वर्ष 28 फरवरी को पूरे भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. कार्यक्रम के अंतिम दिन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद की पुण्यतिथि होने पर उन्हें भावभीनी श्रधान्जली दी गई और उनके विचारों पर मंथन किया गया. आज एसडी पीजी कॉलेज के उन विजेताओं को सम्मानित किया गया जिन्होनें पेपर एंड पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन, पोस्टर मेकिंग और क्विज प्रतियोगिता में प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्थान हासिल किया. विजेताओं को शील्ड और प्रशस्ति पत्र दिए गए.
डॉ अनुपम अरोड़ा ने भारतीय विज्ञान और महान वैज्ञानिकों को विश्व विज्ञान के मस्तक का सितारा बताया. उन्होनें कहा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने इतना कुछ विश्व विज्ञान और भारत को दिया है जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. विभिन्न वैज्ञानिकों का जिक्र करते हुए उन्होनें कहा कि डॉ जगदीश चन्द्र बसु भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक थे जिन्हें भौतिकी, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान तथा पुरातत्व का गहरा ज्ञान था. वे पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने रेडियो और सूक्ष्म तरंगों की प्रकाशिकी पर कार्य किया. वनस्पति विज्ञान में कई महत्त्वपूर्ण खोज करके वे भारत के पहले वैज्ञानिक शोधकर्त्ता बने. इसी प्रकार सुब्रह्मण्यन चन्द्रशेखर विख्यात भारतीय-अमरीकी खगोलशास्त्री थे. परिणामत भौतिकी के क्षेत्र में उनके अध्ययन के लिए उन्हें विलियम ए. फाउलर के साथ संयुक्त रूप से सन 1983 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला. 24 वर्ष की अल्पायु में सन 1934 में ही उन्होंने तारों के गिरने और लुप्त होने की अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा सुलझा ली थी. होमी जहांगीर भाभा भारत के प्रमुख वैज्ञानिक और स्वप्नदृष्टा थे जिन्होंने भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की कल्पना और स्थापना की और फिर मुट्ठी भर वैज्ञानिकों की सहायता से मार्च 1944 में नाभिकीय उर्जा पर अपना अनुसन्धान प्रारम्भ किया. वह टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में संस्थापक निदेशक रहे और उन्हें भारतीय परमाणु कार्यक्रम का जनक माना जाता है. डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को बैलिस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण वाहन प्रौद्योगिकी के विकास पर अपने काम के लिए भारत के ‘मिसाइल मैन’ के रूप में जाना जाता है. उन्होंने 1998 में भारत के पोखरण-द्वितीय परमाणु परीक्षणों में एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक, तकनीकी और राजनीतिक भूमिका निभाई जो 1974 में भारत द्वारा मूल परमाणु परीक्षण के बाद से प्रथम था. भारत का पहला स्वदेशी सैटेलाइट लांच व्हीकल, बैलिस्टिक मिसाइलों का विकास और अग्नि एवं पृथ्वी जैसे प्रक्षेपास्त्रों को स्वदेशी तकनीक से बनाने में डॉ कलाम का योगदान अतुलनीय है. डॉ हरगोविंद खुराना ने न्यूक्लिक एसिड में न्यूक्लियोटाइड का क्रम और जीन की खोज की जो कि मानवीय स्वास्थ्य के दृष्टिकोंण से दुनिया की एक महत्वपूर्ण खोज थी. इनकी खोजों ने चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ा योगदान दिया. वर्ष 1968 में उन्हें फिजियोलॉजी में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. वेंकटरामन रामकृष्णन ने राइबोसोमल प्रोटीन संरचना को हल किया और फिर राइबोसोम में पहले प्रोटीन-आरएनए कॉम्प्लेक्स की संरचना को हल किया जो कि आरएनए के एक टुकड़े के साथ एल11 का है जो इसे बांधता है. राइबोसोम का यह हिस्सा थियोस्ट्रेप्टन जैसे एंटीबायोटिक दवाओं के बनाने में मदद करता है. उनकी इस उपलब्धि पर उन्हें 2009 में रसायन के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. मेघनाद साहा सुप्रसिद्ध भारतीय खगोलविज्ञानी थे जो साहा समीकरण के प्रतिपादन के लिये जाने जाते हैं. यह समीकरण तारों में भौतिक एवं रासायनिक स्थिति की व्याख्या करता है. उनकी अध्यक्षता में गठित विद्वानों की एक समिति ने भारत के राष्ट्रीय शक पंचांग का भी संशोधन किया जो 22 मार्च 1957 से लागू किया गया. बीरबल साहनी ने अपना अनुसंधान जीवाश्म (फॉसिल) पौधों पर किया जिसमें उन्होनें जुरासिक काल के पेड़- पौधों का विस्तार से अध्ययन किया. उन्होंने एक फॉसिल ‘पेंटोज़ाइली’ की खोज भी की जो वर्तमान के झारखंड में स्थित राजमहल की पहाड़ियों में मिला था. यह स्थान आज भी प्राचीन वनस्पतियों के जीवाश्मों का भंडार है. इसी तरह से स्टिल की स्पेक्ट्रम प्रकृति, स्टिल डाइनेमिक्स के बुनियादी मुद्दे, हीरे की संरचना और गुणों एवं अनेक रंगदीप्त पदार्थो के प्रकाशीय आचरण पर सीवी रमन द्वारा किया शोध आज भी मूल्यवान है. उन्होंने ही पहली बार तबले और मृदंगम के संनादी (हार्मोनिक) की प्रकृति की खोज की थी. ये सभी वैज्ञानिक अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित है और हम सभी के आदर्श है. इनकी कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक सोच का कोई विकल्प नहीं है और यदि हम वाकई ऐसी सोच खुद में विकसित कर ले तो बुलंदियां हमारे कदम चूमेंगी. वैज्ञानिक सोच के बढ़ने से ही हम एक जिम्मेदार और जागरूक नागरिक तथा वैज्ञानिक बन सकते है.
अंत में सभी प्रतिभागी विद्यार्थियों से तीन दिवसीय कार्यक्रम का फीडबैक लिया गया जिसपर विद्यार्थियों ने कहा कि उन्हें अब मालूम हुआ है कि विज्ञान में न सिर्फ रोजगार की अपार संभावनाए है बल्कि विज्ञान पढ़कर उनके मन में व्याप्त जिज्ञासाएं और रुढ़िवादी विचार भी ख़त्म हुए है. मानव मस्तिष्क का विस्तार विज्ञान से ही संभव है.

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