Saturday, June 20, 2026
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NEET-UG री-एग्जाम के नाम पर Telegram बैन! अधिवक्ता निखिल चुघ ने उठाए संवैधानिक सवाल

By LALIT SHARMA , in SOCIAL , at June 20, 2026 Tags: , , , ,

BOL PANIPAT । NEET-UG री-एग्जाम से पहले केंद्र सरकार द्वारा Telegram पर लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा है। सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A का हवाला देते हुए कहा कि परीक्षा की निष्पक्षता बनाए रखने तथा कथित पेपर लीक और अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए यह कदम आवश्यक था। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सरकार के इस तर्क को स्वीकार किया।

इस मामले पर अधिवक्ता, लेखक एवं Supreme Court Bar Association सदस्य निखिल चुघ ने कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाए हैं।

निखिल चुघ का कहना है कि नकल और पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह भी है कि क्या किसी पूरे प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाना सबसे प्रभावी उपाय था?

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति और व्यवसाय की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। हालांकि इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन क्या इस मामले में लगाया गया प्रतिबंध उन संवैधानिक सीमाओं के भीतर है? यह एक वैध चर्चा का विषय है।

निखिल चुघ ने कुछ सवाल जनता के सामने रखे हैं—

  • क्या पेपर लीक और नकल की समस्या केवल Telegram तक सीमित थी, या Telegram सिर्फ एक माध्यम था?
  • यदि Telegram बंद हो जाए तो क्या ऐसी गतिविधियां अन्य प्लेटफॉर्म पर नहीं जा सकतीं?
  • क्या संदिग्ध चैनलों और दोषी व्यक्तियों के खिलाफ लक्षित कार्रवाई एक बेहतर विकल्प हो सकती थी?
  • क्या कानूनों के अधिक प्रभावी क्रियान्वयन से भी यही उद्देश्य हासिल किया जा सकता था?
  • क्या यह कदम अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 से जुड़े प्रश्न खड़े करता है?
  • राष्ट्रीय हित और नागरिक स्वतंत्रता के बीच सही संतुलन कहां होना चाहिए?

हालांकि निखिल चुघ ने यह भी स्पष्ट किया कि परीक्षा की निष्पक्षता और छात्रों के हितों की रक्षा करना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है तथा इस उद्देश्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन भविष्य के लिए यह चर्चा अवश्य होनी चाहिए कि क्या ऐसी परिस्थितियों में पूर्ण प्रतिबंध के अतिरिक्त कोई अधिक संतुलित और लक्षित व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जिससे अवैध गतिविधियों पर प्रभावी रोक भी लगे और आम नागरिकों की वैध डिजिटल पहुंच भी यथासंभव प्रभावित न हो।

निखिल चुघ का कहना है कि यह बहस Telegram की नहीं, बल्कि उस सिद्धांत की है कि किसी समस्या से निपटने के लिए कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन बेहतर है या पूरे मंच पर प्रतिबंध। इस प्रश्न का उत्तर समाज, न्यायविदों और नीति-निर्माताओं को मिलकर तलाशना होगा।

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