Friday, April 24, 2026
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एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में एनएसएस, वीमेन सेल और सोशल साइंस एसोसिएशन के तत्वाधान में लोहड़ी का त्यौहार धूमधाम एवं पावन भाव के साथ मनाया गया

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at January 13, 2025 Tags: , , , ,

डीजे की धुनों पर जमकर थिरके प्रबंधकारिणी के पदाधिकारी, स्टाफ और विद्यार्थी

प्रबंधकारिणी, प्राध्यापकों और छात्र-छात्राओं में जोश और उल्लास का नव संचार

सांस्कृतिक गतिविधियों के अलावा स्वयंसेवकों ने बांटी झुग्गी-झोपड़ियों में मूंगफली-रेवड़ी के साथ खुशियां

आशंकाओं, कठिनाइयों एवं शंकाओं के बावजूद भी निरंतर गतिशील एवं धैर्यवान बने रहने का सन्देश लोहड़ी हमें देती है; दिनेश गोयल, प्रधान  

BOL PANIPAT , 13 जनवरी,

एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में कॉलेज एनएसएस यूनिट्स, वीमेन सेल और सोशल साइंस एसोसिएशन के तत्वाधान में लोहड़ी के पावन अवसर पर भव्य समारोह का आयोजन किया गया जिसमे कॉलेज के छात्र-छात्राओं ने कॉलेज प्रधान दिनेश गोयल, उप-प्रधान राजीव गर्ग, कोषाध्यक्ष विशाल गोयल, प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा और स्टाफ सदस्यों ने छात्र-छात्राओं के साथ हिस्सा लिया और डीजे की धुनों पर जमकर डांस किया । लोहड़ी के अवसर पर नई उर्जा और उत्साह से भरे युवाओं ने समाज में जीवन में सैदव विजय होने तथा निरंतर गतिशील रहने का सन्देश सभी को दिया । इस पवित्र अवसर पर सैंकड़ो छात्र-छात्राओं ने सामूहिक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लिया और आग जलाकर एवं रेवड़ी-मूंगफली-गजक की महक के साथ डीजे एवं गीत-संगीत की धुनों पर जमकर नृत्य किया । छात्र-छात्राओं के एकल नृत्य से कार्यक्रम की शुरुआत के बाद कार्यक्रम लोहरी की आग के इर्द-गिर्द सामूहिक नृत्य के साथ अपने उरूज पर पहुंचा । कार्यक्रम का शुभारम्भ एसडी पीजी कॉलेज प्रधान दिनेश गोयल ने अग्नि प्रज्ज्वलित कर किया । विदित रहे कि लोहड़ी का त्यौहार नए वर्ष का प्रथम महत्वपूर्ण पर्व है जिसमे कला, वाणिज्य और विज्ञान संकाय के प्राध्यापको और विद्यार्थीयो ने एक साथ हिस्सा लिया । मकर सक्रांति से एक दिन पूर्व उत्तर भारत विशेषत: हरियाणा और पंजाब में लोहड़ी का त्यौहार मनाया जाता है । किसी न किसी नाम से मकर संक्रांति के दिन या उसके आस-पास भारत के विभिन्न प्रदेशों में कोई न कोई त्यौहार मनाया जाता है जो नयी उर्जा, उत्साह और रौनक का द्योतक होता है । वैसे तो हर वर्ग लोहड़ी का त्यौहार बड़े चाव से मनाता है परन्तु पंजाबियों के लिए लोहड़ी खास महत्व रखती है । लोहड़ी से कुछ दिन पहले से ही छोटे बच्चे लोहड़ी के गीत गाकर लोहड़ी हेतु लकड़ियां, मेवे, रेवडियां, मूंगफली इकट्ठा करने लग जाते हैं । फिर लोहड़ी की संध्या को आग जलाई जाती है जहाँ लोग अग्नि के चारो ओर चक्कर काटते हुए नाचते-गाते हैं और आग मे रेवड़ी, मूंगफली, खील, मक्की के दानों की आहुति मंगलकामनाओं के साथ देते हैं और जीवन के निरंतर बहते रहने का सन्देश देते है । ‘डायमंड का छल्ला’, ‘सेम टाइम सेम जगह ले गई मेरा दिल’, ‘तेरी आंख्या का यू काजल’, ‘गजबन पाणी नै चाल्ली’, ‘बचना ए हसीनों’ जैसे गीतों पर छात्र-छात्राओं ने जमकर डांस किया । 

आज की गतिविधियों में आकर्षण का केंद्र एन.एस.एस. स्वयंसेवकों द्वारा शाम के समय पानीपत शहर की झुग्गी-झोपड़ियों में जाकर मूंगफली और रेवड़ी को गरीब बच्चो में वितरित करना रहा जिससे उन वंचित बच्चों एवं परिवारों के मुख पर भी मुस्कराहट आ गई । 

दिनेश गोयल ने कहा कि आशंकाओं, कठिनाइयों एवं शंकाओं के बावजूद भी निरंतर गतिशील एवं धैर्यवान बने रहने का नाम ही जीवन है । उन्होनें कहा कि भारत के लोग अन्य त्योहारों की तरह लोहड़ी को भी खुशी और उत्साह के साथ मनाते है । यह त्योहार उन त्योहारों में से एक है जिसमे परिवार और दोस्तों को एक साथ इकट्ठा होने का मौका मिलता है और लोग गुणवत्तापूर्वक समय साथ बिताते है । यह त्योहार विशेष रूप से किसानों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जनवरी महीने को फसल का महीना माना गया है । किसानों के लिए यह दिन एक नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत का प्रतीक है । लोग त्योहार और नाच को उजागर करते हुए नृत्य करते है और आग के चारों ओर गायन करते है । ऐसे पावन त्यौहार की सभी को हार्दिक शुभकामनाये । 

प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने विद्यार्थिओं को संबोधित करते हुए उन्हें लोहड़ी का त्यौहार मनाने की परंपरा के बारे में बताया । उन्होनें कहा कि प्राचीन समय में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं जिनको उनका चाचा विधिवत शादी न करके एक राजा को भेंट कर देना चाहता था । उसी समय में दुल्ला भट्टी नाम का एक नामी डाकू हुआ जिसने दोनों लड़कियों, सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उन की शादियां कीं । इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने लड़कियों की मदद की और लड़के वालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का विवाह करवाया । दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया । कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी । जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी न हो सका तो दुल्ले ने उन लड़कियों की झोली में एक सेर शक्कर ड़ालकर ही उनको विदा कर दिया । इस प्रचलित मान्यता का भावार्थ यह है कि ड़ाकू हो कर भी दुल्ला भट्टी ने निर्धन लड़कियों के लिए पिता की भूमिका निभाई और ऐसे भाव की आज के समाज को सर्वाधिक आवश्यकता है । कुछ लोग यह भी मानते है की संत कबीर की पत्नी लोई की याद में यह पर्व मनाया जाता है, इसीलिए इसे लोई भी कहा जाता है । कारण जो भी हो यह त्योहार पूरे उत्तर भारत में धूमधाम से मनाया जाता है ।

छात्र-छात्राओं ने आज भी “सुंदर मुंदरिये, होए, तेरा की विचारा, होए, दुल्ला भट्टी वाला, होए, दुल्ले दी धी वियाई, होए, सेर शकर पाई, होए” गीत गाकर पुरानी परम्पराओं को फिर से जीवित किया । इस अवसर पर सभी टीचिंग और नॉन-टीचिंग के स्टाफ सदस्य भी मौजूद रहे जिनमे प्रो अन्नू आहूजा, डॉ संतोष कुमारी, डॉ राकेश गर्ग, डॉ दीपिका अरोड़ा मदान, डॉ मुकेश पुनिया, डॉ एसके वर्मा, डॉ राकेश गर्ग, प्रो पवन कुमार, प्रो जुगमती, प्रो किरण मलिक, प्रो कविता, दीपक मित्तल आदि ने जम कर डांस किया ।    

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