Thursday, April 16, 2026
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शिक्षा के माध्यम से सामाजिक सेवा करने का नाम ही एनएसएस है: देस राज  

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at March 27, 2022 Tags: , , , ,

एसडी पीजी कॉलेज में सात दिवसीय कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी स्तर एनएसएस कैंप का पांचवां दिन

एकल नृत्य प्रतियोगिता में स्वीटी और साहिल ने मारी बाजी 

BOL PANIPAT : एसडी पीजी कॉलेज में कुरुक्षेत्र विश्वविधालय कुरुक्षेत्र एनएसएस प्रकोष्ठ के सौजन्य से और उच्चतर शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार के प्रायोजन से 23 से 29 मार्च तक चलने वाले सात दिवसीय यूनिवर्सिटी स्तर एनएसएस कैंप का आज पांचवां दिन रहा. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध हस्ती श्री देस राज युवा मामलों और खेल मंत्रालय भारत सरकार रहे जिन्होनें एनएसएस और इसकी उपयोगिता विषय पर प्रतिभागियों के साथ जीवंत संवाद किया. विशिष्ट उपस्थिति में सोनू सिंह प्रोजेक्ट डायरेक्टर रेड क्रॉस आरसीआईटी पानीपत और गरिमा मालिक ईशा फाउंडेशन पानीपत भी कार्यक्रम में उपस्थित रहे. माननीय मेहमानों का स्वागत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, कॉलेज में एनएसएस प्रभारी डॉ राकेश गर्ग और डॉ संतोष कुमारी ने किया. दोपहर के सत्र के पश्चात सभी एनएसएस कार्यकर्ताओं और अधिकारीयों को ऐतिहासिक भ्रमण के लिए पानीपत स्थित काला अम्ब स्मारक पर ले जाया गया. विदित रहे की काला अम्ब स्मारक उन मराठों की याद में बनवाया गया था जिन्होंने 1761 में अहमद शाह अब्दाली के साथ पानीपत की तीसरी लड़ाई में अपनी जान की कुर्बानी दी थी. मराठा सेनाओं का नेतृत्व सदाशिवराव भाऊ, विश्वासराव और महादाजी शिंदे ने किया था. जिस जगह यह लड़ाई लड़ी गई थी ठीक उसी जगह एक आम का पेड़ लगाया गया था. इसलिए इस जगह का नाम काला अम्ब है.

पांचवे दिन एकल नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन हुआ जिसमे महिला वर्ग में शहीद उधम सिंह राजकीय महाविधालय मटक माजरी इंद्री की स्वीटी ने प्रथम, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की ख़ुशी ने दूसरा और राजकीय महाविधालय बहरामपुर बापौली की सविता रावत ने तीसरा स्थान पाया. एकल नृत्य के पुरुष वर्ग में एसडी पीजी कॉलेज पानीपत के साहिल ने प्रथम, गुरु नानक खालसा कॉलेज यमुनानगर के ऋषभ ने दूसरा और पंडित चिरंजीलाल राजकीय महाविधालय करनाल के शिवम ने तीसरा स्थान हासिल किया.

वैश्विक आंदोलन ‘मिटटी बचाओ’ ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु जी ने 21 मार्च से लन्दन में शुरू की है जिसका उद्देश्य 192 देशों में एक नीति लाने का प्रयास है कि यदि आपके पास कृषि भूमि है तो कम से कम 3-6% जैविक सामग्री मिट्टी में होनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ीयां भी चैन से जी सके. इसी प्रयास को लेकर ईशा फाउंडेशन की कार्यकर्ता गरिमा मालिक ने मिटटी बचाने के थीम पर एनएसएस कार्यकर्ताओं के लिए पेंटिंग, प्लाकार्ड, स्लोगन लेखन, मिटटी से बनी कलाकारी इत्यादि की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जिन्हें सोशल मीडिया पर दाल कर आमजन को मिटटी को बचाने के लिए प्रेरित किया जाएगा.  

देस राज युवा मामलों और खेल मंत्रालय भारत सरकार ने कहा कि पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय सेवा योजना में सेवा करना अब केवल प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि छात्रों को पढ़ाई में भी इसका लाभ मिलेगा. विश्वविधालय अनुदान आयोग ने इस संबंध में सभी यूनिवर्सिटीज को नए दिशा निर्देश भेजे है जो एनएसएस छात्रों के लिए और एनएसएस के प्रति प्रोत्साहन के नजरिए से एक अच्छी पहल है. एनएसएस छात्रों को कैम्पों में भाग लेना पड़ता है जिस दौरान उसकी पढ़ाई बाधित होती है. नए दिशा निर्देशों के होने से निश्चित तौर पर कार्यकर्ताओं को पढ़ाई में भी फायदा मिलेगा. उन्होनें कहा की सामाजिक सरोकार में सबसे आगे एनएसएस ही रहती है. सामाजिक सेवा को  शिक्षा से जोडकर एनएसएस काम करता है. गांवों की तस्वीर बदलनी हो या फिर सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को आम लोगों तक पहुंचाना हो, हर काम में बेमिसाल भूमिका निभाने का काम एनएसएस के द्वारा ही हो रहा है. एनएसएस का प्रतीक चिंह कोणार्क सूर्य मंदिर के रथ के चक्र से प्रेरित होकर बनाया गया है. इस चक्र में प्रहरों को दर्शाने वाली आठ तीलियां हैं जो इसके स्वयंसेवकों को आठों प्रहर निरंतर रचनात्मक गतिशीलता के लिए प्रेरित करती है. प्रतीक चिंह में रंगों का प्रयोग भी किया गया है और ये मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से अपना विशेष महत्व रखते हैं.

सोनू सिंह प्रोजेक्ट डायरेक्टर रेड क्रॉस आरसीआईटी पानीपत ने अपने उर्जापूर्ण भाषण में एनएसएस कार्यकर्ता होने के मायने समझाए. उन्होनें कहा कि कॉलेज में पढने वाले विद्यार्थियों में एनएसएस कार्यकर्ता सबसे सौभाग्यशाली एवं श्रेष्ठ है और उन पर सबसे अधिक जिम्मेदारी होती है. उन्होनें कहा कि रेडक्रॉस का जमा का निशान सकारात्मकता का सूचक होता है और ऐसी ही सकारात्मकता हर कार्यकर्ता में होनी चाहिए. नर की सेवा ही नारायण सेवा है और एनएसएस कार्यकर्ता को सैदव दूसरो की मदद के लिए तत्पर रहना चाहिए.

प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि ऐतिहासिक नजरिए से देखा जाए तो पानीपत के मैदान पर ऐसी तीन ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ीं गईं जिन्होंने पूरे देश की तकदीर और तस्वीर बदलकर रख दी थी. काला अंब स्मारक पानीपत की तीसरी और अंतिम ऐतिहासिक लड़ाई की याद में बनाया गया है. यह लड़ाई 250 वर्ष पूर्व 14 जनवरी 1761 को मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ और अफगानी सेनानायक अहमदशाह अब्दाली के बीच हुई थी. इस युद्ध को भारत में मराठा साम्राज्य के अंत के रूप में भी देखा जाता है क्यूंकि इस युद्ध में अहमदशाह अब्दाली की जीत हुई थी. उसी मैदान पर आज ‘काला अंब’ नाम का स्मारक है. ‘अंब’ पंजाबी का शब्द है और इसका मतलब होता है ‘आम’ का फल. ‘काला अंब’ के साथ एक अनोखी बात भी जुड़ी है. कहा जाता है कि पानीपत के तृतीय युद्ध के दौरान इस जगह पर एक काफी बड़ा आम का पेड़ हुआ करता था. ऐसी कहानी प्रचलति है कि लड़ाई के बाद सैनिक इसके नीचे आराम किया करते थे. यहां हुए युद्धों में इतना खून बहा कि इस इलाके की मिट्टी लाल हो गई. कहा जाता है कि इसका असर इस आम के पेड़ पर भी पड़ा.

       इस अवसर पर स्टाफ सदस्यों में डॉ एसके वर्मा, डॉ मुकेश पुनिया, डॉ बलजिंदर सिंह, प्रो सनी, प्रो सोनिका, प्रो हिमानी, प्रो मनमीत सिंह, प्रो मनोज कुमार, दीपक मित्तल मौजूद रहे. 

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