एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर एनएसएस कार्यकर्ताओं को किया गया जागरूक.
–स्वास्थ्य विभाग पानीपत के जिला मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम के मार्गदर्शन में मनाया जा रहा है विश्व आत्महत्या रोकथाम सप्ताह
–खुदकुशी बुजदिली का काम, मौत नहीं कोई हल, जिंदगी को लगाएं गले: डॉ अनुपम अरोड़ा
BOL PANIPAT , 10 सितम्बर, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के अवसर पर एनएसएस कार्यकर्ताओं एवं विद्यार्थियों को जागरूक करने हेतू स्वास्थ्य विभाग पानीपत के जिला मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम द्वारा एक दिवसीय सेमीनार का आयोजन किया गया । डिप्टी सीएमओ डॉ ललित वर्मा के मार्गदर्शन में विनोद कुमार मनोचिकित्सक एवं सामाजिक कार्यकर्ता और संगीता सामुदायिक नर्स ने कॉलेज में पधारकर एनएसएस कार्यकर्ताओं को बढती आत्महत्या की प्रवृति के कारणों और इसके निदान के उपायों के बारे विस्तार से चर्चा की. मेहमानों का स्वागत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, एनएसएस प्रभारी डॉ राकेश गर्ग और डॉ संतोष कुमारी ने किया. विदित रहे कि दुनियाभर में आत्महत्या एक बड़ी समस्या बनती जा रही है. चाहें वह कम उम्र के विद्यार्थी हो या फिर वो लोग जो अपने जीवन में किसी समस्या से ग्रसित हो, अंत में हार मानकर अपनी जान को गंवाने का फैसला उठा लेते हैं. अब इन मामलों की संख्या तेजी बढ़ रही हैं जिसके चलते ही प्रत्येक वर्ष 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस के रूप में मनाया जाने लगा है.
डॉ ललित वर्मा ने अपने सन्देश में कहा कि प्रत्येक वर्ष लाखों लोग आत्महत्या करके अपनी जान को गवां बैठते हैं और इसमें सबसे बड़ी संख्या युवाओं की है जिनकी उम्र 15 से 30 साल के बीच होती है. ऐसे व्यक्तियों को अगर सही और समय पर मदद मिले तो इन्हें ऐसा करने से रोका जा सकता है. कोटा (राजस्थान) जैसी घटनाएं हमारे समाज के लिए चिंता का विषय है. खुदकुशी बुजदिली का काम है. मौत किसी भी समस्या का हल नहीं है. हमें हर हाल में जिंदगी को गले लगाना चाहिए.

विनोद कुमार ने कहा कि सकारात्मक विचार हमें आत्महत्या के विचारों से दूर ले जा सकते है. सकारात्मक विचार हमारे दिमाग में डोपामाइन एवं नोरपेनेफिरन जैसे रासायनिक द्रव्य की सक्रियता को बढ़ाते हैं जिससे व्यक्ति को खुशी एवं आनंद की अनुभूति होती है. सकारात्मक सोच के कारण उपापचय संतुलित होता है जिसके कारण मन में मनोविकार उत्पन्न नहीं होते हैं. सकारात्मक सोच तनाव को ऊर्जा में रूपांतरित करके व्यक्ति की ताकत बना देते हैं. इसलिए उन्होनें नशीले पदार्थों के सेवन से दूर रहने की सलाह दी और विद्यार्थियों को व्यायाम, योग, प्राणायाम, डायरी लिखना, पेंटिंग करना और अच्छे साहित्य को पढ़ने की सलाह दी. नवविवाहित युवाओं पर परिवार चलाने-रिश्तों को निभाने की जिम्मेदारी रहती है, विद्यार्थी वर्ग पर पढ़ाई और प्रतियोगिताओं में कामयाब होने का दबाव रहता है. कई लोग विकट आर्थिक स्थिति के कारण अवसाद में चले जाते है. किसानों और मजदूरों पर भी तरह-तरह की समस्याएं आती रहती है. इसके चलते इन्हें आत्महत्या के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं सूझता है जो की सरासर एक गलत सोच और कदम है. जीवन में ऐसी कोई समस्यां नहीं है जिसका कोई हल न हो.
डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि बच्चों के स्वभाव में सतत परिवर्तन दिखाई दे तो हमें सतर्क हो जाना चाहिए. नींद में कमी, भोजन में अरुचि, अकेला रहने की आदत, चिड़चिड़ापन, नकारात्मक प्रवृत्ति, आक्रामकता, संवेगिक अस्थिरता आदि मनोवैज्ञानिक एवं शारीरिक लक्षणों को हमें कभी भी अनदेखा नहीं करना चाहिए. आवश्यकता पड़ने पर हमें मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक की सलाह लेनी चाहिए. जब भी हमारा मन हताश एवं निराश हो और खुदकुशी का विचार आने लगे तो तत्काल हमें अपने करीबी दोस्त या परिवार के किसी सदस्य से बात साझा करनी चाहिए. हमें उम्मीदों का दामन हमेशा थामे रहना चाहिए और नकारात्मक विचारों को त्यागकर जिंदगी से प्यार करना चाहिए. जिन्दगी दोबारा कभी नहीं मिलती है.

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