‘संस्कृत वाङ्मय में राष्ट्रचिंतन’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्टी का आयोजन किया।
BOL PANIPAT : आई.बी.स्नातकोत्तर महाविद्यालय में उच्चतर शिक्षा निदेशालय हरियाणा द्वारा अनुमत व संस्कृत विभाग के तत्वावधान में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हाइब्रिड मोड में आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय ‘संस्कृत वाङ्मय में राष्ट्रचिंतन’ रहा। ऑनलाइन प्रतिभागी इस संगोष्ठी में माइक्रोसॉफ्ट टीम माध्यम से जुड़े । संगोष्ठी का शुभारंभ महाविद्यालय प्रबंधन समिति के प्रधान धर्मबीर बत्रा, उप-प्रधान बलराम नंदवानी, महासचिव लक्ष्मी नारायण मिगलानी, प्रबंधन समिति के सदस्य परमवीर ढींगरा व युधिष्ठिर मिगलानी, कॉलेज प्राचार्य डॉ. अजय कुमार गर्ग, उप-प्राचार्या डॉ. शशि प्रभा, संयोजिका डॉ. अंजलि, सह-संयोजिका डॉ किरण मदान की गरिमामयी उपस्थिति में दीप प्रज्ज्वलित कर वेदमंत्रोच्चारण के साथ किया गया। प्रबंधन समिति के प्रधान धर्मबीर बत्रा ने कहा कि किसी भी विद्वान्, प्राध्यापक, शोधकर्ता के लिए संगोष्ठी मे हिस्सा लेना अति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रकार के आयोजन से उनके आत्मविश्वास और ज्ञान में वृद्धि होती है। कॉलेज प्राचार्य डॉ अजय कुमार गर्ग ने कहा कि संस्कृत भाषा का साहित्य अनेक अमूल्य ग्रन्थ रत्नों का सागर है, इतना समृद्ध साहित्य किसी भी दूसरी प्राचीन भाषा का नहीं है। अनेक प्राचीन एवं अर्वाचीन भाषाओं की यह जननी है। भारत के सांस्कृतिक ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक दार्शनिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन की संपूर्ण व्याख्या संस्कृत वाङ्मय के माध्यम से आज उपलब्ध है | इसी कारण इस भाषा को अमर भाषा या देव भाषा के नाम से सम्मानित किया |
कार्यक्रम संयोजिका डॉ. अजलि ने अपने वक्तव्य मे संगोष्ठी का उद्देश्य बताते हुए कहा कि भारत वर्ष में क्षेत्रीय विषमताओं के होने पर भी जिन तत्वों ने इस देश को एक सूत्र में बाँध रखा है, उनमे संस्कृत भाषा तथा इसका साहित्य प्रमुख है | संस्कृत साहित्य ने उत्तर-दक्षिण या पूर्व-पश्चिम का भेदबाव मिटाकर प्रत्येक नागरिक को भारतीय होने का स्वाभिमान प्रदान किया है | मुख्यातिथि पद्मश्री डॉ. सुकामा आचार्या ने अथर्ववेद के भूमि सूक्त के मन्त्र पर व्याख्यान दिया व बताया कि हम कैसे अपने राष्ट्र को स्वतंत व उत्तम बना सकते है। हमें सत्य, न्यायपूर्ण व्यवहार अपनाना चाहिए। सारस्वत अतिथि, प्रो. सोमदेव शतांशु ने व्याख्यान में बताया कि गोवंश का होना राष्ट्र के सुख के लिए आवश्यक है। गौवंश के अभाव में शारीरिक विकास कम हो रहा है। बीज वक्ता प्रो. सुधीर कुमार ने बताया कि भारत की प्राचीन संस्कृत भाषा अत्यंत समर्थ, संपन्न और ऐतिहासिक महत्त्व की भाषा है और इस भाषा का वांग्मय भी अत्यंत व्यापक, सर्वोतोमुखी, मानतावादी है। डॉ. विश्वेश वाग्मी ने भी अपने वक्तव्य में बताया कि हम सभी को मित्र की भांति रहना चाहिए। डॉ. भारद्वाज भर्गाए ने अपने वक्तव्य में बताया कि संस्कृत भाषा और साहित्य का राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से बहुत महत्त्व है। संगोष्ठी में सभी प्रभागियों ने अपने विचार रखे एवं शोध पत्र प्रस्तुत किए। मंच का संचालन डॉ.मोनिका वर्मा, प्रो. हिमांशी एवं सोनिया वर्मा ने किया। कार्यक्रम की सहसंयोजिका डॉ. किरण मदान ने सभी का धन्यवाद करते हुए कहा सभी वक्ताओं द्वारा बताई गई बातो को हमें आत्मसात करना चाहिए। संस्कृत वाङ्मय, भारतीय संस्कृति का मेरुदंड है जिसमे ज्ञान विज्ञान, धर्म और दर्शन के साथ राष्ट्र चिंतन का अनमोल भण्डार सम्माहित है। ऋग्वेद से लेकर आज तक संस्कृत भाषा के माध्यम से सभी प्रकार के वांग्मय का निर्माण होता रहा है। इस संगोष्ठी के सफल आयोजन पर प्रबंधन समिति ने संयोजिका एवं पूरी समिति को बधाई दी। इस अवसर पर उपप्राचार्या डॉ. शशि प्रभा , IQAC संयोजक डॉ. विक्रम कुमार, डॉ. सुनीता ढांडा, डॉ. पूनम गुप्ता, डॉ. पूजा रानी, डॉ. नीतू मनोचा, प्रिया बरेजा, राहुल, रवि, मोहित, विकास, पूजा, ज्योति प्राध्यापक मौजूद रहे। |

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