देश को कानून का डर नहीं, कानून पर विश्वास चाहिए : अधिवक्ता निखिल चुघ
BOL PANIPAT । किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल कठोर कानूनों या सख्त दंड व्यवस्था में नहीं, बल्कि नागरिकों के उस विश्वास में निहित होती है कि कानून सभी के लिए समान है और न्याय निष्पक्ष रूप से मिलेगा। आज जब देश में न्यायिक सुधार, सुशासन और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर लगातार चर्चा हो रही है, तब यह समझना भी उतना ही आवश्यक है कि कानून का स्थायी सम्मान भय से नहीं, बल्कि विश्वास से स्थापित होता है।
कानूनी जागरूकता के क्षेत्र में लगातार सक्रिय अधिवक्ता, लेखक एवं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य निखिल चुघ ने कहा कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को दंडित करना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक में यह विश्वास पैदा करना भी है कि उसके अधिकार सुरक्षित हैं और आवश्यकता पड़ने पर न्याय व्यवस्था उसके साथ खड़ी होगी। उनका कहना है कि यदि नागरिकों को यह भरोसा हो कि कानून बिना किसी भेदभाव के सभी पर समान रूप से लागू होता है, तो कानून का पालन केवल दंड के डर से नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और संवैधानिक कर्तव्य के रूप में किया जाएगा। यही किसी भी मजबूत लोकतंत्र की पहचान है।
निखिल चुघ ने कहा कि कानून के प्रति विश्वास तभी मजबूत होता है, जब न्याय तक आम नागरिक की पहुँच सरल हो, प्रक्रियाएँ पारदर्शी हों और प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानजनक व्यवहार मिले। उन्होंने कहा कि कानूनी जागरूकता भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब नागरिक अपने अधिकारों, कर्तव्यों और संवैधानिक मूल्यों को समझते हैं, तब वे न केवल स्वयं कानून का पालन करते हैं, बल्कि समाज में भी कानून के प्रति सकारात्मक वातावरण तैयार करते हैं। उनके अनुसार जागरूक नागरिक ही कानून के शासन (Rule of Law) को वास्तविक अर्थों में मजबूत बनाते हैं।
उन्होंने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना केवल आर्थिक विकास, आधुनिक तकनीक या बड़े बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं हो सकती। एक विकसित राष्ट्र की पहचान यह भी है कि वहाँ का सामान्य नागरिक बिना किसी भय के न्याय की अपेक्षा कर सके और उसे यह विश्वास हो कि कानून उसके अधिकारों की समान रूप से रक्षा करेगा। न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा जितना मजबूत होगा, लोकतांत्रिक संस्थाएँ भी उतनी ही अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनेंगी।
अंत में निखिल चुघ ने कहा, “डर व्यक्ति के व्यवहार को कुछ समय के लिए नियंत्रित कर सकता है, लेकिन विश्वास समाज की सोच को बदल देता है। भारत को ऐसे नागरिकों की आवश्यकता है जो कानून से भयभीत नहीं, बल्कि कानून पर विश्वास रखने वाले हों। क्योंकि न्यायपूर्ण, उत्तरदायी और विकसित राष्ट्र की सबसे मजबूत नींव कानून में जनता का अटूट विश्वास ही है।”

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