स्वच्छ हवा में सांस लेना हर नागरिक का अधिकार है और पर्यावरण को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी: उपायुक्त डॉ हरीश कुमार वशिष्ठ
पर्यावरण संरक्षण में लापरवाही बर्दाश्त नहीं, नियम तोड़ने वालों पर होगी कार्रवाई
पराली का धुआं स्वास्थ्य के लिए खतरा, सांस और फेफड़ों की बीमारियों से बचाव के लिए जागरूकता जरूरी
प्रशासन का किसानों को जागरूक कर पर्यावरण बचाने पर जोर
BOL PANIPAT , 20 अक्टूबर। हरियाणा सरकार की ओर से पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने और वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए किसानों को जागरूक किया जा रहा है। उपायुक्त डॉ. हरीश कुमार वशिष्ठ ने किसानों से आह्वान किया कि वे फसल अवशेषों को खेतों में आग लगाने के बजाय उनका उचित प्रबंधन करें और दूसरे किसानों को भी पराली न जलाने के लिए प्रेरित करें।
उपायुक्त ने कहा कि खेतों में पराली जलाने वाले किसानों अथवा व्यक्तियों के खिलाफ नियमानुसार उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी। स्वच्छ हवा में सांस लेना हर नागरिक का अधिकार है और पर्यावरण को सुरक्षित रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। पराली जलाने से निकलने वाला धुआं न केवल वायु प्रदूषण बढ़ाता है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसलिए किसान पराली प्रबंधन के वैकल्पिक उपाय अपनाएं और इस अभियान को जन आंदोलन बनाने में सहयोग करें।
उपायुक्त ने संबंधित विभागों को निर्देश दिए कि पराली जलाने की चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह कमर कस लें। किसानों को जागरूक करने, फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन के विकल्पों की जानकारी देने तथा पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी निगरानी रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए।
उपायुक्त डॉ हरीश ने बताया कि वायु प्रदूषण से सांस और फेफड़ों से संबंधित बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा सामान्य स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में सांस लेने से जीवन प्रत्याशा कम होने और असमय मृत्यु का जोखिम बढ़ सकता है।
खेतों में पराली जलाने से हवा में सूक्ष्म प्रदूषक कणों, विशेषकर पीएम 2.5, का स्तर बढ़ता है। इससे सिरदर्द और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। प्रदूषित हवा अस्थमा सहित कई गंभीर बीमारियों के जोखिम को बढ़ाती है। ऐसे में पराली जलाने से बचना केवल कानूनी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपने परिवार और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य की रक्षा करने का भी महत्वपूर्ण कदम है। इससे
मिट्टी की गुणवत्ता पर भी पड़ता है प्रतिकूल प्रभाव
पराली जलाने से केवल वायु प्रदूषण ही नहीं बढ़ता, बल्कि मिट्टी की जैविक गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। आग लगाने से मिट्टी में मौजूद कई उपयोगी बैक्टीरिया और कीट नष्ट हो सकते हैं, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को नुकसान पहुंचता है। इसलिए किसानों को फसल अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करना चाहिए, ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ कृषि भूमि की गुणवत्ता भी बनी रहे।
उपायुक्त ने बताया कि किसान पराली को जलाने के बजाय उससे जैविक खाद तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा फसल अवशेषों का इस्तेमाल बायोमास ऊर्जा उत्पादन, छप्पर बनाने और मशरूम की खेती जैसे कार्यों में किया जा सकता है। पराली की बेल्स बनाकर उन्हें उद्योगों तथा पैलेट और ब्रिकेट्स बनाने वाली कंपनियों को बेचकर भी उपयोगी बनाया जा सकता है।
उपायुक्त ने किसानों से अपील की कि वे पराली जलाने की बजाय इन वैकल्पिक उपायों को अपनाएं और अन्य किसानों को भी इसके लिए प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि प्रदूषण हटाओ, जीवन बचाओ का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब प्रत्येक किसान पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी निभाएगा।
हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से भी किसानों और आमजन को पराली न जलाने, वायु प्रदूषण पर नियंत्रण रखने तथा पर्यावरण को स्वच्छ एवं सुरक्षित बनाने के लिए जागरूक किया जा रहा है।
उपायुक्त ने कहा कि पराली न जलाएं, पर्यावरण बचाएं और स्वयं के साथ नई पीढ़ी को भी सुरक्षित व स्वस्थ भविष्य दें।

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