समाज की गिरती संवेदना पर प्रासंगिक दृष्टिकोण पर विचार विमर्श किया
BOL PANIPAT : आई.बी. स्नातकोत्तर महाविद्यालय पानीपत में हिंदी विभाग द्वारा क्लास एक्टिविटी के तहत आंतरिक मूल्यांकन हेतु दो दिवसीय असाइनमेंट प्रस्तुतीकरण का आयोजन डॉ. शर्मिला यादव के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों द्वारा किया गया। कार्यभार के रूप में साहित्य के अंतर्गत निहित राष्ट्रीय भावना, समाज, नैतिकता, आदर्शवाद, नारी जागरण, छायावादी काव्य की वैयक्तिक अनुभूति, सौंदर्यपरता, भारतीय संस्कृति की गरिमा निराला के काव्य में निहित विद्रोह महादेवी के काव्य की मानवीय पीड़ा, जयशंकर प्रसाद के वसुधैव कुटुंबकम आदि विषय पर इन्होंने अपने कार्यभार को प्रस्तुत किया। सभी विद्यार्थियों ने आज समाज की गिरती संवेदना पर प्रासंगिक दृष्टिकोण पर विचार विमर्श कर बताया कि युवक की भूमिका कैसी होनी चाहिए । बी. ए. द्वितीय वर्ष के इस कार्यभार प्रस्तुतीकरण में तनु शर्मा प्रथम रही।
कॉलेज प्राचार्य डॉ अजय कुमार गर्ग ने कहा कि साहित्य और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। साहित्यकारों के संवेदना विचारों से हमारी संस्कृति को नवीन ऊर्जा मिलती है। उन्होंने बताया कि भारत भूमि सदैव ही गरिमामयी रही है और उसकी प्रेरणा हमें कवियों के विचारों से मिलती है जैसे कभी प्रसाद ने कहा कि “औरों को हंसते देखो ममु, हंसो और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो सब को सुखी बनाओ।”अर्थात आपसी भाईचारा भारतीय समाज की प्राचीनतम परंपरा रही हैइस कार्यक्रम की संयोजिका डॉ शर्मिला यादव ने बताया कि साहित्य मात्र हमें पढ़ना ही नहीं उसको अपने जीवन में आत्मसात भी करना है | दुखात्मकवृत्ति और सुखात्मकवृत्ति जब भी जीवन में आती है तब हमारा धैर्य विचलित होने लगता है उस समय साहित्यकारों एवं संतों की वाणी ही संजीवनी बूटी बन हमारे मन के अंतर्गत संयम पैदा कर हमें पलायन के मार्ग से निर्माण के मार्ग की प्रेरणा देती है। भारतीय संस्कृति के मूल तत्व दया, ममता, करुणा, प्रेरणा हमें इन कवियों की कविताओं से ही प्राप्त होती हैं इसलिए साहित्य का व्यक्ति ज्यादा समाज के प्रति ज्यादा संवेदनशील होता है |

Comments