Friday, April 17, 2026
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प्रसिद्ध समाजसेवी व लेखिका कंचन सागर ने साहित्य अर्पण उत्तराखंड की शाखा के “सावन-मनभावन” कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की

By LALIT SHARMA , in SOCIAL , at July 22, 2025 Tags: , , , ,

BOL PANIPAT : अंतरराष्ट्रीय साहित्य अर्पण की ओर से उनकी सी.ई.ओ. नेहा शर्मा ने प्रसिद्ध समाजसेवी,लेखिका कंचन सागर को साहित्य अर्पण उत्तराखण्ड की शाखा देवभूमि उत्तराखंड सृजन शाखा के “सावन-मनभावन” के ऑनलाइन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया।
यह जानकारी स्वयं कंचन सागर ने दी। उन्होंने कहा कि वह प्रथम बार ऐसे कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं थीं।
आदरणीय सपना यशवर्धन ने विशिष्ट अतिथि के तौर पर शिरकत की।
प्रिय नेहा शर्मा जी सी.ई.ओ. ने सर्वप्रथम मां शारदा को नमन किया। तत्पश्चात संरक्षक आदरणीय सुधीर अधीर को सरस्वती वंदना के लिए आमंत्रित किया गया। साहित्यिक मंच उत्तराखंड बहुत भाग्यशाली है जिसके संरक्षक आ.सुधीर अधीर जी हैं।
फिर नेहा शर्मा ने कंचन सागर से कार्यक्रम शुरू करने की अनुमति माँगी।
नीरू गुप्ता ने मधुरता से सम्बन्ध सम्मान रखूँ,मॉं देना मुझे ऊर्जा पर बहुत सुंदर गीत गाया।
आदरणीय नन्द किशोर ने बरखा की गिरती फुहार,सखी देखो सावन आया रे, पर स्वरचित गीत गाया।
साहित्य अर्पण पटल के सभी सुधीजनों ने अपने लिखे गीत गाकर सब को मंत्रमुग्ध कर दिया।
जिन में रुड़की से कुवंर सौ  सिंह सैनी, देहरादून से उपसचिव संगीता वर्मानी , अंशु जैन ,शोभा, सन्तोष , हेमचन्द हेमन्त , हिमांशु जोशी , गिरीश त्रिपाठी आदि सभी ने सावन पर मधुर गायन कर आश्चर्यचकित कर दिया।
अंशु जैन की कंचन सागर से दोस्ती फेसबुक से हुई थी।
प्रिय नेहा शर्मा ने बहुत ही सुमधुर स्वर में कंचन सागर की उपलब्धियों को बताया।
फिर कंचन सागर को मंच पर आमंत्रित किया गया। उन्होंने पहले अंतरराष्ट्रीय साहित्य अर्पण की सी.ई.ओ के बारे में बताया कि वह एक बहुमुखी प्रतिभाशाली रचनाकार हैं जो इतनी कम उम्र में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति हासिल कर चुकी हैं। वह हिन्दी साहित्य के लिए एक आशीर्वाद हैं।
फिर उन्होंने सावन पर लिखी बचपन का सावन पर अपनी कविता के दो शब्द प्रस्तुत किए।
बचपन में पहले सावन पर क्या करती थी और अब क्या कर रहे हैं…..
अब भीगने से हम डरते हैं
तब मिट्टी में खेला करते थे।
अब बचपन नहीं रहा,
न ही किस्से रहे पुराने
बदले वक्त ने बदल दिए हैं
जीवन के सभी फ़साने,
उन सभी पलों की यादें मुझको आज आकर रुलाती हैं
जीवंत हो उठता है बचपन
जब सावन की बारिश आती है।
जिसे काफी सराहा गया।
दो घंटे के बाद संगीता के धन्यवाद से यह कार्यक्रम समाप्त हुआ।

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