एसडी पीजी कॉलेज पानीपत और अखिल भारतीय साहित्य परिषद् द्वारा हिंदी दिवस समारोह का भव्य आयोजन
हिंदी एक सनातन भाषा-अविरल धारा, हिंदी का भविष्य उज्जवल है: प्रदीप शर्मा अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद्
हिंदी भाषा पर इतना गर्व करो कि यह हमारी पहचान और हमारा साक्षात्कार बन जाए: प्रदीप शर्मा अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद्
पानीपत, 13 सितम्बर.
एसडी पीजी कॉलेज पानीपत और अखिल भारतीय साहित्य परिषद् द्वारा हिंदी दिवस के अवसर पर भव्य समारोह का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता मुख्य अतिथि वरिष्ठ अधिवक्ता और अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के अध्यक्ष प्रदीप शर्मा ने की. अतिविशिष्ट उपस्थिति में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के महासचिव करण कपूर उपस्थित रहे. उनके साथ कार्यक्रम में प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ भारती गुप्ता, सांस्कृतिक गतिविधियों की प्रभारी डॉ संगीता गुप्ता, डॉ एसके वर्मा, प्रो कविता, प्रो जुगमती, प्रो सुनील, प्रो सचिन, प्रो किरण मलिक, प्रो इंदु पुनिया, प्रो मोनिका खुराना, डॉ दीपा वर्मा, प्रो मंजीत, प्रो ममता आदि ने शिरकत की. हिंदी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर के दिन हिंदी को राजभाषा का आधिकारिक दर्जा मिलने की खुशी में मनाया जाता है. हिंदी दिवस का महत्व भारत में भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रति गहरी भावना और समर्पण का प्रतीक है. हिंदी दिवस भारत की एकता और एकजुटता का प्रतीक है. हिंदी भाषा भारत की विविधता को एक साथ लाने में मदद करती है और भारतीय संगठन को एक बनाने का काम करती है. हिंदी भाषा भारतीय समाज में एकता और एकजुटता की संजीवनी है और देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले लोगों को एक साथ लाती है. कार्यक्रम में प्रो सचिन, प्रो सुनील, डॉ जुगमती, प्रो ममता, प्रो मंजीत और डॉ संतोष कुमारी ने अपने स्वरचित कवितओं का पाठ किया. मंच संचालन प्रो कविता ने किया.

प्रदीप शर्मा वरिष्ठ अधिवक्ता और अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने हिंदी की अविरल धारा को हमेशा आगे बढ़ाने के लिए सभी का आह्वान किया और कहा कि संस्कृत की बेटी और भारत माता के मस्तक पर तिलक की तरह सुसज्जित हिंदी पर हम सभी को गर्व होना चाहिए और अपने निजी जीवन में हमें हिंदी को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए. उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति और भाषाओं का अपना स्थान और सम्मान है किंतु आज भी हम सभी भारतीय स्वप्न हिंदी में ही देखते हैं किसी विदेशी भाषा में नहीं. हम अपने व्यक्तिगत जीवन में प्रेम की अभिव्यक्ति में, बड़ो को मान सम्मान देने में, आपसी संवाद में अपनी राष्ट्रभाषा का ही प्रयोग करते हैं. हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है क्योंकि अब यह वैश्विक पटल पर भी उतना ही सम्मान प्राप्त कर रही है. उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में हिंदी के विकास में हिंदी फिल्मी कलाकारों और हिंदी फिल्मों ने अहम भूमिका अदा की है. उन्होंने हिंदी भाषा के उद्भव और विकास पर भी विस्तार से प्रकाश डाला. हिंदी भाषा के प्रयोग से न सिर्फ हमारा उच्चारण शुद्ध होता है बल्कि हिंदी हमारे रग-रग में समाहित होकर हमारी संस्कृति को भी संजोती है. आज हिंदी जनमानस की भाषा बन गई है. हिंदी अब सर्वव्यापक है बस इसको लेकर हमें अपनी सोच बदलनी होगी. वर्तमान में सरकारी कार्यालयों में भी हिंदी का प्रयोग बढ़ा है.
प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने अपने वक्तव्य में कहा कि मानविक एवं कला के विषय ही एक मात्र विषय है जो समाज के भले और इंसानियत के भाव को संजोते और आगे बढाते है. भाषा इंसान को इन्सान से जोड़कर इंसानियत का पैगाम देती है. हिंदी मात्र एक भाषा नहीं अपितु राष्ट्रीय संस्कृति की प्रतीक, ध्वजवाहक एवं संरक्षक है. तकनीक के इस युग में पाश्चात्य प्रभाव से विदेशी भाषाओं का विशेष तौर पर अंग्रेजी का प्रचलन यद्यपि बढ़ा है. परंतु भारत राष्ट्र एवं इसके नागरिकों में युवा पीढ़ी में राष्ट्रीय मुद्दों व संस्कृति का विनाश न हो इस दृष्टिकोण से हिंदी के महत्व को हमें पूर्णतया समझना और अपनाना है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हित में सभी को निरंतर प्रयास करने चाहिए ताकि हिंदी भारतीय युवा में लोकप्रिय रहे और हमारे युवा जितना हिंदी से जुड़ पाएंगे उतने ही जिम्मेदार व समर्पित नागरिक बन पाएंगे. किसी दूसरी भाषा पर दोष मढ़ने की आदत से हमें बचना होगा. अगर हिंदी को उसका उचित स्थान हम दिला नहीं पाए है तो इसके लिए सिर्फ हम जिम्मेदार है कोई और नहीं. इस अवसर पर प्राचार्य ने मैथिलिशरण गुप्त की कविता का मधुर स्वर में पाठ किया जिसपर श्रौता झूम उठे. प्राचार्य ने गाया-
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है, अवनि और अम्बरतल में,
पुलक प्रकट करती है धरती,
हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे है तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से.
पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर,
जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है.
डॉ जुगमती ने अपनी स्वरचित कविता पेश कर सभी को भाव विभोर कर दिया–
हिंदी में अक्षर साफ़ सभी, बिंदी की भी जगह बड़ी,
कोई अक्षर खामोश नहीं, अनदेखा जो कर पाओ कभी,
छोटे-बड़े का भेद नहीं, आधे अक्षर से खेद नहीं,
आधा भी जाता नहीं व्यर्थ, मिलकर देता पूर्ण अर्थ.
हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ भारती गुप्ता ने कहा कि उन्हें व सभी हिंदी शिक्षकों को हिंदी का शिक्षक होने पर गर्व है क्योंकि हिंदी मात्र सफलता ही नहीं संस्कार की भाषा है. उन्होंने बल दिया कि प्रत्येक व्यक्ति चाहे उसका कोई भी रोजगार या व्यवसाय क्यों न हो उसे कुछ न कुछ हिंदी साहित्य का अध्ययन करते रहना चाहिए. यह व्यक्तित्व में पूर्णता व स्थिरता के लिए नितांत आवश्यक है.

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