अन्तःकरण में प्रेम श्रद्धा व विशुद्ध भाव है तो ईश्वर मिलन अवश्यम्भावी है।
BOL PANIPAT : (12 फरवरी) आज प्रातःकाल के सत्र में श्री प्रेम मन्दिर पानीपत की साध्वी पूनम जी ने अपनी सखियों के साथ संगीतमय गणेश वन्दना के साथ कीर्तन आरम्भ करके गुरूदेव की महिमा गुणगान किया। जब भी जहां भी ठाकुर जी के भजन होते हैं वहां राधा जी के नाम के बिना सब अधूरा सा लगता है। जब राधा नाम का गुणगान होता है तब क्या नर और क्या नारी पूरे भाव से झूमे बिना न रह सके। कुछ इसी प्रकार के वातावरण ने सबको आनन्द विभोर कर दिया। सत्र के समापन से पूर्व श्री हरमिलाप मिशन हरिद्वार के परमाध्यक्ष सत्गुरूदेव जी परम पूज्य श्री मदन मोहन जी हरमिलापी ने दर्शन देकर संगत को गदगद कर दिया। सबने बहुत ही उल्लास से उनका स्वागत किया।
श्री प्रेम मन्दिर पानीपत के प्रेम सम्मेलन की दूसरी बैठक में सन्तों ने अपने पावन प्रवचनों में उपदेश देते हुए कहा कि ईश्वर उन भक्तों को सुलभ है जिनका अन्तःकरण शुद्ध प्रेम से ओतप्रोत व भावमय है। उन्होंने सद्ग्रन्थों के माध्यम से शबरी, महात्मा विदुर, मीरा आदि परम भक्तों के पवित्र चरित्रों का वर्णन किया। बाबा तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के माध्यम से फरमाया कि प्रभु सुग्रीव को समझाते हुए कहते हैं ‘निर्मल मन जन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा’ विभीषण चाहे रावण का भाई था लेकिन उनके अन्तःकरण में प्रेमाभक्ति श्रद्धा व शुद्ध भाव के होने में कोई सन्देह नहीं है।
प्रत्येक वर्ष इस प्रकार के सम्मेलनों का मूल उद्देश्य यही है कि हम सभी अपने गृहस्थ के कार्यों से समय निकालकर सतगुरूदेव सन्तों व मनीषियों के दर्शन व सन्देशों उपदेशों का श्रवण करें मनन करें व अपने दैनिक जीवन में अमल करें। सबमें ईश्वर का वास है। इसलिए सद्गुरूदेव फरमाते हैं कि ‘‘हर में हरि निहारि के हर से करो मिलाप, घृणा, द्वेष फिर क्यों रहें सब हैं अपना आप’’ ‘प्रेम का मन्दिर है प्रेम का स्थान है प्रेम से जो जीव आवे उसका ही कल्याण है।’
आज चण्डीगढ़, दिल्ली, आगरा, करनाल, अम्बाला, सोनीपत, वृन्दावन से प्रेमियों ने अपनी हाजिरी लगवाने के लिए दरबार में उपस्थित हुए।

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