Monday, July 27, 2026
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एनएसएस कार्यकर्ताओं ने किया कुरुक्षेत्र भ्रमण.रत्नावली का भी लिया आनंद. 

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at October 25, 2024 Tags: , , , ,

एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में सात दिवसीय राष्ट्रीय एकता शिविर (नेशनल इंटीग्रेशन कैंप) का पांचवां दिन.

पोस्टर मेकिंग, स्लोगन लेखन, रंगोली, मेहँदी और कोलाज प्रतियोगिताओं में स्वयंसेवकों ने लिया बढ़-चढ़ कर हिस्सा.

BOL PANIPAT , 25 अक्टूबर,

  एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में सात दिवसीय राष्ट्रीय एकता शिविर (नेशनल इंटीग्रेशन कैंप) के पांचवें 17 राज्यों के 200 स्वयंसेवकों ने पोस्टर मेकिंग, स्लोगन लेखन, रंगोली, मेहँदी और कोलाज प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया जिसके विजेताओं को समापन समारोह में सम्मानित किया जायेगा । कैंप समन्वयक डॉ आनंद कुमार कुरुक्षेत्र विश्वविधालय का स्वागत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, प्रोग्राम ऑफिसर डॉ राकेश गर्ग, डॉ संतोष कुमारी, डॉ तेनजिंग नोर्जोम भूटिया, डॉ शशीकला कुमारी, डॉ एल  मंजू भार्गवी, डॉ फारुक अहमद वनी, डॉ आरती दुबे और डॉ परमिंदर कौर ने किया । मंच संचालन डॉ संतोष कुमारी ने किया । सात दिवसीय कैंप के पांचवें दिन सभी स्वयंसेवकों ने सुबह के सत्र में योग और ध्यानशाळा में हिस्सा लिया । दूसरे सत्र में स्वयंसेवकों को दोपहर के भोजन के बाद एतिहासिक जिले कुरुक्षेत्र के भ्रमण पर ले जाया गया जहाँ स्वयंसेवकों ने रत्नावली महोत्सव का आनंद लिया और कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों के दर्शन किये । देश के सुदूर प्रदेशों से आये एनएसएस कार्यकर्ताओं और प्रोग्राम ऑफिसर्स के लिए यह एक यादगार और भावनात्मक यात्रा रही । स्वयंसेवकों ने ब्रह्मसरोवर, सन्निहित सरोवर, शक्तिपीठ श्री भद्रकाली मन्दिर, ज्योतिसर (श्रीमद्भागवतगीता उपदेश स्थली), श्री स्थानेश्वर महादेव मन्दिर आदि के दर्शन किये ।

डॉ आनंद कुमार ने कहा कि श्री स्थानेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और महाभारत की पौराणिक लड़ाई से पहले भगवान कृष्ण और पांडवों की प्रार्थना स्थली है । मंदिर में एक पवित्र पानी की टंकी है जिसके बारे में कहा जाता है कि इस पानी को पीने से सभी बीमारियां ठीक हो जाती हैं । इसी तरह कुरुक्षेत्र में शेख चिल्ली का मकबरा है जो प्रसिद्ध सूफ़ी संत शेख चिल्ली के पार्थिव अवशेषों के लिए जाना जाता है । यह फ़ारसी शैली की वास्तुकला का उदाहरण है । ज्योतिसर वह जगह है जहां भगवान कृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दिया था । कुरुक्षेत्र पैनोरमा एंड साइंस सेंटर एक बेलनाकार इमारत है जहां आगंतुकों के लिए प्रदर्शनियां होती हैं और विज्ञान के विभिन्न उपकरण भी दर्शाए गये है । ब्रह्मसरोवर भी कुरुक्षेत्र के प्रमुख तीर्थ स्थानों में से एक है । इस विशाल तालाब का निर्माण महाकाव्य ‘महाभारत’ में वर्णित कौरवों और पांडवों के पूर्वज राजा कुरु ने करवाया था । कुरुक्षेत्र नाम ‘कुरु के क्षेत्र’ का प्रतीक है । हर्ष का टीला सम्राट हर्षवर्धन से संबंधित पुरातात्विक स्थल माना जाता है । 

डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि कुरुक्षेत्र का इलाका भारत में आर्यों के आरंभिक दौर में बसने (लगभग 1500  ई.पू.) का क्षेत्र रहा है और यह महाभारत की पौराणिक कथाओं से जुड़ा है । इसका वर्णन भगवद्गीता के पहले श्लोक में मिलता है । इसलिए इस क्षेत्र को धर्म क्षेत्र कहा गया है । थानेसर नगर राजा हर्ष की राजधानी थी जिसे सन 1011 ई. में महमूद गज़नवी ने तहस-नहस कर दिया था । आरम्भिक रूप में कुरुक्षेत्र ब्रह्मा की यज्ञिय वेदी कहा जाता था पजीर आगे चलकर इसे समन्तपंचक कहा गया, जबकि परशुराम ने अपने पिता की हत्या के प्रतिशोध में क्षत्रियों के रक्त से पाँच कुण्ड बना डाले, जो पितरों के आशीर्वचनों से कालान्तर में पाँच पवित्र जलाशयों में परिवर्तित हो गये । आगे चलकर यह भूमि कुरुक्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध हुई जब कि संवरण के पुत्र राजा कुरु ने सोने के हल से सात कोस की भूमि जोत डाली थी । कुरुक्षेत्र का पौराणिक महत्त्व अधिक माना जाता है । इसका ऋग्वेद और यजुर्वेद में अनेक स्थानो पर वर्णन किया गया है । यहाँ की पौराणिक नदी सरस्वती का भी अत्यन्त महत्त्व है । इसके अतिरिक्त अनेक पुराणों, स्मृतियों और महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत में इसका विस्तृत वर्णन किया गया हैं । विशेष तथ्य यह है कि कुरुक्षेत्र की पौराणिक सीमा 48 कोस की मानी गई है जिसमें कुरुक्षेत्र के अतिरिक्त कैथल, करनाल, पानीपत और जींद का क्षेत्र सम्मिलित हैं ।  

डॉ तेनजिन नोर्जोम भूटिया (सिक्किम) ने कहा कि इस प्रकार के भ्रमण से छात्रों को नए अनुभव मिलते हैं जिसका इस्तेमाल वे अपने करियर के लिए कर सकते हैं । इससे छात्रों का व्यक्तित्व विकसित होता है और उन्हें कॉलेज जीवन की एकरसता से फायदा मिलता है । अज्ञात की खोज और जिम्मेदारी की भावना भी हम ऐसे न्ह्राम्नों से विकसित कर सकते है । . 

बिहार से पधारी शशीकला कुमारी ने कहा कि ऐसे भ्रमणों से छात्रों को संस्कृतियों का अनुभव होता है और वे मतभेदों का सम्मान करना सीखते हैं । छात्रों के क्षितिज और ज्ञान का विस्तार भी इस प्रकार के आयोजन करते है । वास्तविक दुनिया से सीखने का मौका और सहपाठियों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने का अवसर ऐसे भ्रमण हमें देते है । यह एक नए वातावरण का अनुभव भी है । 

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