Wednesday, October 28, 2026
Newspaper and Magzine


प्रख्यात साहित्यकार एवं शिक्षाविद् दीपचंद निर्मोही का निधन, साहित्य और शिक्षा जगत में शोक

By LALIT SHARMA , in SOCIAL , at October 28, 2026 Tags: , , , , ,

राम मोहन राय ने कहा—वे मेरे अभिभावक, मार्गदर्शक और वैचारिक पिता थे

BOL PANIPAT । प्रख्यात साहित्यकार, कवि, लेखक एवं आर्य स्कूल, पानीपत के पूर्व प्राचार्य श्री दीपचंद निर्मोही के निधन से साहित्य, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है। उनके निधन पर अमेरिका प्रवास पर गए सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता, गांधी ग्लोबल फैमिली के महासचिव एवं निर्मला देशपांडे संस्थान के निदेशक राम मोहन राय ने गहरा दुख व्यक्त किया है।

राय ने कहा कि निर्मोही जी से उनकी पहली मुलाकात वर्ष 1973 में हुई थी, जब उन्होंने आर्य स्कूल में आठवीं कक्षा में प्रवेश लिया। खादी की सफेद धोती-कुर्ता पहनने वाले निर्मोही जी का सौम्य व्यक्तित्व, सरल व्यवहार और प्रार्थना सभा में प्रस्तुत विचार उन्हें शुरू से प्रभावित करते रहे। लगभग 34 वर्षों तक आर्य स्कूल में सेवाएँ देने वाले निर्मोही जी बाद में उसी विद्यालय के प्राचार्य बने, जहाँ राय ने मैनेजर के रूप में कार्य किया। उनका संबंध गुरु-शिष्य की औपचारिकता से आगे बढ़कर गहरे पारिवारिक स्नेह में बदल गया।

मुजफ्फरनगर जिले के खुद्दा गाँव में जन्मे निर्मोही जी आर्य समाज के संस्कारों से प्रभावित थे। हिंदी के प्रबल समर्थक निर्मोही जी ने कविताओं की रचना की तथा सामाजिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक विषयों पर 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं। अपने मित्र श्री सुदर्शन के सहयोग से उन्होंने हरियाणा साहित्यकार संघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे प्रगतिशील लेखक आंदोलन और गांधीवादी रचनात्मक कार्यों से भी जुड़े रहे।

राय ने बताया कि वर्ष 2007 में शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जन्मशताब्दी के अवसर पर वंचित बच्चों की शिक्षा के लिए चेतना विद्यालय स्थापित करने की पहल की गई। निर्मोही जी ने एक वर्ष में 100 चेतना विद्यालय स्थापित करने का संकल्प लिया और उसे पूरा करने के लिए अथक प्रयास किए। बढ़ती उम्र के बावजूद वे साइकिल से निकलकर बच्चों की शिक्षा के लिए सहयोग जुटाते रहे।

राम मोहन राय ने भावुक होते हुए कहा, “मेरे जैविक माता-पिता ने मुझे जन्म दिया, लेकिन मेरे विचारों को दिशा देने और सामाजिक चेतना विकसित करने में दीपचंद निर्मोही जी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे मेरे लिए बड़े भाई, मित्र, अभिभावक और वैचारिक पिता थे। श्रीमती कमला जी ने भी मुझे सदैव अपनी संतान की तरह स्नेह दिया।”

राय ने कहा कि निर्मोही जी का निधन उनके लिए अपूरणीय व्यक्तिगत क्षति है। उन्होंने साहित्यकारों, विद्यार्थियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि निर्मोही जी की पुस्तकों, लेखन और सामाजिक योगदान को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।

“निर्मोही जी भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके विचार, संस्कार और समाज के प्रति समर्पण सदैव हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”

Comments


Leave a Reply