Tuesday, June 2, 2026
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एस डी पीजी कॉलेज पानीपत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, हरियाणा प्रांत के 22वें त्रेवार्षिक प्रांतीय अधिवेशन का शानदार आगाज़

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at July 12, 2025 Tags: , , , , ,

मुख्य अतिथि महीपाल ढांडा, शिक्षा मंत्री हरियाणा सरकार ने किया  अधिवेशन का शुभारम्भ

ऐसा साहित्य लिखें जो मानव का विकास भी करें और उसमें संस्कार भी पैदा करें: महीपाल ढांडा

साहित्य में व्यक्ति एवं राष्ट्र निर्माण की असीम संभावनाएं: महीपाल ढांडा

शिक्षा मंत्री ने की अखिल भारतीय साहित्य परिषद् हरियाणा को दो लाख के अनुदान की घोषणा

शिक्षा मंत्री ने किया हरियाणा साहित्य एवं सस्कृति अकादमी पंचकुला द्वारा आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी का उदघाटन       

BOL PANIPAT , 12 जुलाई. एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, हरियाणा प्रांत के दो दिवसीय 22वें त्रेवार्षिक प्रांतीय अधिवेशन का शानदार आगाज़ मुख्य अतिथि महीपाल ढांडा, शिक्षा मंत्री हरियाणा सरकार के कर कमलों से हुआ | दो दिवसीय अधिवेशन का विषय ‘आत्मबोध से विश्वबोध’ है | प्रथम दिवस के सत्र की अध्यक्षता सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ अध्यक्ष हरियाणा प्रांत ने की | बतौर विशिष्ट अतिथि शरद अग्रवाल अतिरिक्त महाधिवक्ता हरियाणा और सानिध्य डॉ पूर्णमल गौड़ मार्गदर्शक हरियाणा प्रांत और डॉ मंजुलता रेडू उपाध्यक्ष हरियाणा प्रांत ने मुख्य वक्ता के तौर पर भाग लिया | हरीश यादव अध्यक्ष और रणबीर आर्य समाज सेवी एवं उद्योगपति भी प्रथम सत्र का हिस्सा बनें | साय: कालीन सत्र में हरीश धनसोइयाँ विशिष्ट मेहमान के तौर पर, विधु कालरा अध्यक्ष गुरुग्राम इकाई मुख्य वक्ता, संतोष गर्ग उपाध्यक्ष हरियाणा प्रांत, प्रदीप शर्मा प्रधान अखिल भारतीय साहित्य परिषद् पानीपत इकाई और रमेश खुराना मार्गदर्शक अखिल भारतीय साहित्य परिषद पानीपत इकाई ने अधिवेशन में अपने अनुभव और ज्ञान को साझा किया | रात्री के सत्र में काव्य संध्या का आयोजन किया गया जिसमें ख्याति प्राप्त तथा नवोदित कवीयों ने भाग लिया | अधिवेशन में आकर्षण का केंद्र विभिन्न परिषद् की विभिन्न इकाइयों से पधारे साहित्यकारों कि 11 नयी कृतियाँ रही जिनका विमोचन माननीय शिक्षा मंत्री ने किया | मंच संचालन डॉ संतोष कुमारी और मनोज ने किया | मेहमानों का स्वागत एसडी एजुकेशन सोसाइटी (रजि.) पानीपत के सचिव नरेश गोयल और प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने किया |

आज विमोचित कृतियों में प्रोफेसर सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ रचित ‘गुरु-गौरव अमृत-कलश (मनुराज प्रकाशन), डॉ जगदीप शर्मा ‘राही’ कृत ‘ठंड्या आले खेत’ (निर्मला प्रकाशन), डॉ महेंद्र सिंह ‘सागर’ कृत नाटक ‘हवन’ (शब्दश्री प्रकाशन), लाज्पर राय गर्ग कृत ‘प्रेम के सियाह रंग’ (बोधि जन संस्करण), डॉ विनोद कुमार शर्मा कृत ‘अदृश्य रंग’ (साहित्य कलश पब्लिकेशन), डॉ मनोज भारत का यात्रा संस्करण ‘ऐसा देश है मेरा’ (साहित्य गार), गीता सैनी कृत ‘आत्म मंथन और मंजु मानव रचित ‘मेरी ऊँगली तेरे गीत’ (समदर्शी प्रकाशन) शामिल रही |   

महीपाल ढांडा शिक्षा मंत्री हरियाणा सरकार ने कहा कि सभ्यताओं, गीत-संगीत, लोक गाथाएं,आदि को संजोने का काम साहित्य और साहित्यकारों का होता है | दुनिया में क्रान्ति पैदा करने का सबसे बड़ा हथियार  साहित्य ही है | हमारा जीवन दर्शन कैसा हो, दुनिया में शान्ति और अमन कैसे स्थापित हो, यह सभी काम साहित्यकारों के जिम्मे होते है | जीवन की श्रेष्ठ कृति हमारी सर्वोत्तम पूंजी है | हर व्यक्ति साहित्यकार नहीं बन सकता | यह कला कुछ ही लोगों में विद्यमान होती है | साहित्यकार बिना कुछ कहे अपनी जिम्मेदारी चुप-चाप निभाता है और तभी साहित्य  समाज के लिए नए आयाम पैदा करता है | उन्होनें अधिवेशन में भाग लेने वाले प्रत्येक साहित्यकार और लेखक से आग्रह किया कि वे इस अधिवेशन में अपने चिंतन से देश और विदेश सभी के लिए कुछ बेहतर विचार पैदा करें | साहित्य ऐसा होने चाहिए जो हमारा विकास भी करें और हममें संस्कार भी भरे | साहित्य में जीवन का रस भी होना चाहिए |

सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ अध्यक्ष हरियाणा प्रांत ने कहा कि शिक्षा मंत्री द्वारा दो लाख रुपये के अनुदान से ज्यादा उन्हें इस बात की ख़ुशी हुई है की माननीय मंत्री ने हिंदी भाषा को लेकर जो नया कदम उठाया है | हिंदी के आवश्यक प्रयोग का फैसला आर्थिक सहयोग से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और ठोस है | 

 रात्री में आयोजित कवी सम्मलेन में प्रो सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ ने कहा:

पतझर का सिंहासन होता, बाकी बची बहार न होती।

भामा शाह नहीं होते तो,राणा की तलवार नहीं होती।

सोनिया ‘अक्स’ ने कहा: 

जब नये पल हाथ आये तो पुराने खो गये 

भीड़ में लम्हों की सदियों के खजाने खो गये

खो गई नानी की लोरी, खो गए दादी के गीत

गर्मियों की छुट्टियों के सब बहाने खो गये 

– डॉ मनोज भारत ने कहा :

कोई भाषा प्रांत हो, कैसा भी वो वेश।

धर्म जाति या पंथ कुछ, सबसे पहले देश।।

डॉ महेन्द्र सिंह ‘सागर’

ठीक कब है हुई हाँ हर बात की।

उलझने बहुत सुलझी इनकार से।

डॉ.जगदीप शर्मा ‘राही’

भारत मां के भाल की बिंदी ।

हिंद के दिल का हाल है हिंदी ।। 

मैं हिंदी को पहनूं-ओढूं । 

मां ममता की शाल है हिंदी ।।

विनोद आचार्य ने गाया : 

गीत नहीं है दर्द है ये एक टूटे दिल के तारे का ।

डूबा हूँ मझदार में मैं कुछ, क्यूँ देखूं दोष किनारे का ।

अनिल कुमार पृथ्वीपुत्र ने कहा :

नमस्य भारती महा 

नमो-नमो शुभंकरा ।

नमामि पावनी प्रभा,

दयामयी वसुंधरा।

      डॉ अनुपम अरोड़ा ने प्रोफेसर सारस्वत मोहन मनीषी का परिचय देते हुए कहा कि साहित्य के क्षेत्र में अपनी विभिन्न विधाओं के माध्यम से हरियाणा में अनेक लेखक और साहित्यकारों ने समाज को नया आयाम देने के लिए अपनी विभिन्न विधाओं में साहित्य साधना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । हरियाणा गौरवान्वित करने वाले ऐसे ही साहित्यकारों में शुमार सुप्रसिद्ध गीतकार,गजलकार, व्यंग्यकार एवं चिंतक डा. सारस्वत मोहन ने हिंदी और हरियाणवी दोनों में साहित्य सृजन किया है । उन्होंने अपनी साहित्य साधना में समाजिक सरोकार के साथ राष्ट्र को सर्वोपरि रखते हुए राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मंचों पर काव्यपाठ करके लोकप्रियता हासिल की है । उन्होंने गणतंत्र दिवस पर आयोजित लाल किला पर होने वाले कवि सम्मेलनों के मंच से अनेक बार काव्यपाठ किया है । ‘सदा अहिंसा सर्वोत्तम मन की कस्तूरी है, दुष्ट नहीं माने तो हिंसा भी बहुत जरुरी है’ पंक्तियों के रचयिता रहे विलक्षण कलमकार प्रोफेसर डा. सारस्वत मोहन ‘मनीषी’ ने अपने साहित्यिक सफर में अनेक ऐसे पहलुओं को उजागर किया है, जिसमें उनकी राष्ट्वाद की अवधारणा से देशभर में समाज को सकारात्मक विचाराधारा के प्रति प्रेरित करने का साफ संकेत देखा जा सकता है । राष्ट्रीय स्तर के सुप्रसिद्ध गीतकार,गजलकार, व्यंग्यकार एवं चिंतक प्रोफेसर सारस्वत मोहन मनीषी का जन्म 6 मई 1950 को उनके ननिहाल जयपुर (राजस्थान) में हुआ । महेंद्रगढ़ से उच्च शिक्षा हासिल करने वाले डा मनीषी अध्यापन के क्षेत्र में चार दशक सेवा देने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कालेज से 2015 में हिंदी प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हुए हैं । एक शिक्षक के रुप में उन्होंने 1975 कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से सेवा देना शुरु किया । इसके बाद उन्होंने दो साल वैश्य कालेज भिवानी और 1981 से 1991 तक डीएवी पीजी) अबोहर (पंजाब) में अध्यापन का कार्य किया । फिर उन्होंने 1991 से सेवानिवृत्ति तक आर्यभट्ट कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी प्रोफेसर के रुप में सेवाएं दी । दूरदर्शन और आकाशवाणी केंद्र के अलावा उन्होंने देश व विदेशों में मंच पर सैकड़ो बार काव्य पाठ करके श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया है । प्रोफेसर डा. सारस्वत मोहन ने विभिन्न विधाओं में 14 पुस्तकों की रचना है । उनकी इन रचनाओं में आग के अक्षर, आधा कफ़न, बूँद-बूँद वेदना (ग़ज़ल सिंग्रह), कलम नहीं बेचेंगे, जंग अभी जारी है, एक हक़ीक़त और (खंडकाव्य), मनीषी सतसई (777 दोहे), आर-पार हो जाने दो, शब्द यज्ञ (450 मुक्तक), वामन विराट (महाकाव्य), सारस्वत सतसई (777 दोहे), मोहन सतसई (777 दोहे), सरजीवण सतसई (777 दोहे) तथा मरजीवण सतसई (777 दोहे) शामिल हैं ।

विदित रहे कि अखिल भारतीय साहित्य परिषद् की स्थापना 27 अक्तूबर 1966 को दिल्ली में हुई और उसी वर्ष इसका राष्ट्रीय अधिवेशन प्रसिद्ध साहित्यकार जैनेन्द्र जी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ | इसका उद्देश्य भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाओ की उन्नति करना, भारतीय साहित्य एवं भाषाओं के अनुसंधान कार्य को प्रोत्साहन तथा तत्संबंधी अनुसंधान केंद्र की स्थापना करना, भारतीय भाषाओं में परस्पर आदान-प्रदान और सहयोग को बढ़ावा देना, भारतीय जीवन-मूल्यों में आस्था रखने वाले साहित्यकारों को प्रोत्साहित करना तथा अच्छे साहित्य के प्रकाशन और प्रसारण में सहयोग करना, जनमानस में भारतीय साहित्य के प्रति आस्था तथा अभिरुचि उत्पन्न करना, साहित्य सामाजिक परिवर्तन का वाहक बन कर राष्ट्र की प्रगति में प्रभावी भूमिका निभा सके, इसके लिए प्रयास करना और  इन सारे उद्देश्यों की पूर्ति हेतु कार्य समिति द्वारा निर्णीत अन्य कार्य करना है | 

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