एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा संत शिरोमणि सतगुरु श्री रविदास जी महाराज की जयंती को श्रद्धाभाव के साथ मनाया गया
–स्वयंसेवकों ने उठाई जात-पात और सामाजिक बुराइयों को खत्म करने की शपथ
–विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना और सद्व्यवहार ही मनुष्य को महान बनाते है: डॉ राकेश गर्ग
BOL PANIPAT , 23 फरवरी :
एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की राष्ट्रीय सेवा योजना के स्वयंसेवकों द्वारा संत शिरोमणि सतगुरु श्री रविदास जी महाराज की जयंती को श्रद्धाभाव के साथ मनाया गया और इस पावन अवसर पर स्वयंसेवकों ने समाज में व्याप्त जात-पात और सामाजिक बुराइयों को खत्म करने की शपथ उठाई । कॉलेज में आयोजित समारोह की विधिवत शुरुआत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा और एनएसएस प्रोग्राम ऑफिसर डॉ राकेश गर्ग ने की । उनके साथ डॉ पवन कुमार, प्रो मनोज कुमार, प्रो विशाल गर्ग, प्रो हिमानी नारंग, प्रो आशीष गर्ग और प्रो सोनिका शर्मा ने भी संत रविदास के चित्र पर पुष्प अर्पित कर अपने आदर भाव को अभिव्यक्त किया । विदित रहे कि गुरु रविदासजी मध्यकाल के एक भारतीय संत थे और उन्हें संत शिरोमणि सत गुरु की उपाधि दी गई है । इन्होंने रविदासीया पंथ की स्थापना की और उनके द्वारा रचे गए कुछ भजन सिख लोगों के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं । उन्होनें जात-पात का घोर खंडन किया और इंसान को आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया । इस अवसर पर स्वयंसेवकों ने कॉलेज प्रांगण में साफ़-सफाई की और अन्य छात्र-छात्राओं को सभी के साथ एक सामान व्यवहार करने की प्रेरणा दी ।
डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि संत रविदास के जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से उनके वचन के पालन सम्बन्धी गुणों का पता चलता है । उन्होनें ही कहा था कि मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है । कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि – मन चंगा तो कठौती में गंगा । रैदास ने ऊँच-नीच की भावना तथा ईश्वर-भक्ति के नाम पर किये जाने वाले विवाद को सारहीन तथा निरर्थक बताया और सबको परस्पर मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने का उपदेश दिया । रविदासजी स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे । उनका विश्वास था कि राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं । वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है ।
कृष्ण, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा ।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा ॥
चारो वेद के करे खंडौती । जन रैदास करे दंडौती ।।
रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव प्रेम से ओत-प्रोत है और इसलिए श्रोताओं के मन पर उनका गहरा प्रभाव पड़ता है । उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिली जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो पाया और लोग स्वतः उनके अनुयायी बन गए । उनकी वाणी का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके श्रद्धालु बन गये । कहा जाता है कि मीराबाई भी उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी ।
डॉ राकेश गर्ग ने कहा कि आज भी सन्त रैदास के उपदेश समाज के कल्याण तथा उत्थान के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं । उन्होंने अपने आचरण तथा व्यवहार से यह प्रमाणित कर दिया है कि मनुष्य अपने जन्म तथा व्यवसाय के आधार पर महान नहीं होता है । विचारों की श्रेष्ठता, समाज के हित की भावना से प्रेरित कार्य तथा सद्व्यवहार जैसे गुण ही मनुष्य को महान बनाने में सहायक होते हैं । इन्हीं गुणों के कारण सन्त रैदास को अपने समय के समाज में अत्यधिक सम्मान मिला और इसी कारण आज भी लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं । उनके बताये मार्ग पर चलकर ही हम समाज को नई दिशा दिखा सकते है ।

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