Monday, May 18, 2026
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एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में ‘कला और सोशल साइंस में समकालीन रुझान’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस का शानदार आगाज़

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at March 18, 2023 Tags: , , , ,

-इंसान और इंसानियत को जिन्दा रखने की ताकत मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विषयों में है: प्रो सुदेश कुलपति, बीपीएसएम खानपुर कलां (सोनीपत)
-हर प्रकार के विज्ञान की शुरुआत मूल्यों और संस्कृति से होती है: प्रो राजेश गिल, पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़

उच्चतर शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित कांफ्रेंस में देश के विभिन्न राज्यों से आये 600 से अधिक प्रतिभागियों ने कराया पंजीकरण

BOL PANIPAT , 18 मार्च, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में उच्चतर शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस का शानदार आगाज मुख्य अतिथि प्रो सुदेश कुलपति भगत फूल सिंह महिला विश्वविधालय खानपुर कलां (सोनीपत) के कर कमलों से हुआ. कीनॉट संबोधन प्रो राजेश गिल समाजशास्त्र विभाग पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ ने दिया. प्रथम दिन के पहले तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ राजेन्द्र कुमार अरोड़ा प्राचार्य राजकीय कन्या महाविधालय चीका (पेहोवा) ने की और उन्होनें क्रिप्टोकरेंसी विषय पर अपना व्याख्यान भी दिया. माननीय मेहमानों का स्वागत कांफ्रेंस के संरक्षक एसडी पीजी कॉलेज प्रधान पवन गोयल, उप-प्रधान मनोज सिंगला, जनरल सेक्रेटरी तुलसी सिंगला, कोषाध्यक्ष विकुल बिंदल और कांफ्रेंस के संयोजक एवं कॉलेज प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने पुष्प रोपित गमलें और शाल भेंट करके किया. मंच संचालन प्रो अन्नू आहूजा और डॉ दीपिका अरोड़ा ने किया. कांफ्रेंस की शुरुआत सरस्वती वंदना और दीप प्रज्जवलन से हुई. कांफ्रेंस में पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार आदि राज्यों से आये प्राध्यापक, शोधकर्ता और विद्यार्थी भाग ले रहे है. कलिंगा यूनिवर्सिटी रायपुर (छत्तीसगढ़) से कोमल ने राजनीती शास्त्र, ओम स्टर्लिंग यूनिवर्सिटी हिसार से रणदीप सिंह ने डायसपोरा साहित्य पर, प्रो संजीव चौहान राजकीय महाविधालय नारायणगढ अम्बाला ने आलोचनात्मक सिद्धांतो विषय पर, संदीप देसवाल सेंट्रल यूनिवर्सिटी महेंद्रगढ़ ने शारीरिक शिक्षा विषय पर, हेमंत भाटिया ज्योति विद्यापीठ महिला विश्वविधालय जयपुर (राजस्थान) फार्मासुटिकल विज्ञान पर, अभिषेक वर्मा मणिपाल यूनिवर्सिटी जयपुर ने लेखन कला पर, तब्बसुम बानो एचडी जैन कॉलेज अरा भोजपुर (बिहार) ने विधि पर, नीरज चौधरी चंडीगढ़ विश्वविधालय ने वाणिज्य और प्रबंधन विषय पर, संचिता कलिंगा यूनिवर्सिटी छत्तीसगढ़ आदि ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये.

प्रो सुदेश कुलपति भगत फूल सिंह महिला विश्वविधालय खानपुर कलां (सोनीपत) ने अपने व्याख्यान में कहा कि कला और सामाजिक विज्ञान विषयों का दायरा और परिदृश्य वर्तमान में बहुत बदल गया है. जो कुछ विज्ञान ने इंसान को दिया है उसे बचाने और संजोने की जिम्मेदारी इन्ही विषयों के जिम्मे है. विज्ञान ने हमारे जीवन को आरामदायक और खुशहाल बनाया है परन्तु मानवता पर मंडरा रहे खतरों के लिए भी विज्ञान ही उत्तरदायी है. ऐसे में कला और सामाजिक विज्ञान विषयों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण एवं निर्णायक हो जाती है. समय आ गया है कि हम पाश्चात्य के सन्दर्भ के बजाये खुद अपनी जरूरतों और मापदंडों के माध्यम से इस विषयों का विस्तार और इनकी व्याख्या करे. इस प्रकार की कांफ्रेंस को आयोजित करने का उद्देश्य केवल मात्र अकादमिक नहीं होना चाहिए बल्कि विभिन्न सत्रों के विमर्श से हमें कला और सामाजिक विज्ञान की विभिन्न समस्याओं और सवालों के हल खोजने के प्रयास करने चाहिए. मात्र एपीआई स्कोर को हासिल करने के लिए इस प्रकार की कांफ्रेंस में आने का कोई औचित्य नहीं है. इंसान और इंसानियत को जिन्दा रखना अब हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए. अध्यापकों और शोधकर्ताओं में आत्म-विश्वास का होना नितांत आवश्यक है. हर वह विषय जो समाज के लिए फायदेमंद है वह प्रासंगिक और और जरुरी है. उन्हें भरोसा है कि यहाँ आया एक-एक प्रतिभागी इंसान और इंसानियत को आगे बढाने के कुछ न कुछ योगदान अवश्य देगा.

प्रो राजेश गिल समाजशास्त्र विभाग पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ ने कीनॉट संबोधन में कहा कि हर प्रकार के विज्ञान की शुरुआत मूल्यों और संस्कृति से होती है और ये मूल्य हमें साहित्य, मानविकी और सामाजिक विज्ञान जैसे विषय सिखाते है. विज्ञान के मुकाबले में कला और सामाजिक विज्ञान के विषयों को पढना और पढ़ाना ज्यादा चुनौतीपूर्ण कार्य है. विज्ञान के मुकाबले में ये विषय अधिक गतिशील है और वैसे भी कोरोना आपदा और रूस-युक्रेन युद्ध ने हमें मानविकी विषयों की प्रासंगिकता को जता दिया है. आज बेशक लोग मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विषयों को पढ़ते और चुनते हुए हिचकते है. इसीलिए सरकार भी इस प्रकार के पाठ्यक्रमों के लिए वितीय सहायता भी कम ही देती है. परन्तु सच यह है कि बिना साहित्य, इतिहास, राजनीति शास्त्र आदि विषयों के अध्ययन के वैज्ञानिकों और निति निर्धारकों के लिए नीतियाँ बनाना और उन्हें लागू करना मुश्किल है. जीवन का आधार द्विआधारी है और इसलिए केवल मात्र प्राकृतिक विज्ञान पर भरोसा करना कदापि उचित नहीं है. सांस्कृतिक अवधारणाओं के कारण ही मानव का अस्तित्व सुरक्षित है और हमें चाहिए की हम विज्ञान और मानविकी में उचित सामंजस्य स्थापित करें ताकि इंसान का भविष्य इस धरती पर सुरक्षित हो सके. उन्हें उम्मीद है कि इस कांफ्रेंस में उपजे नए विचार और धारणाएं इन्सान को नई ऊँचाइयों पर ले जायेंगी.

डॉ राजेन्द्र कुमार अरोड़ा प्राचार्य राजकीय कन्या महाविधालय चीका (पेहोवा) ने अपना व्याख्यान क्रिप्टोकरेंसी विषय पर दिया. उन्होनें कहा कि क्रिप्टोमुद्रा या क्रिप्टोकरेंसी एक डिजिटल संपत्ति है जिसे एक्सचेंज के माध्यम के रूप में काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. इसमें व्यक्तिगत सिक्का स्वामित्व रिकॉर्ड को एक कम्प्यूटरीकृत डेटाबेस के रूप में मौजूद बहीखाता के रूप में संग्रहित किया जाता है. क्रिप्टोकरेंसी आमतौर पर भौतिक रूप में मौजूद नहीं होता है और इसे किसी केंद्रीय प्राधिकरण द्वारा जारी नहीं किया जाता है. क्रिप्टोकरेंसी आमतौर पर केंद्रीयकृत डिजिटल मुद्रा और केंद्रीय बैंकिंग प्रणालियों के विपरीत विकेंद्रीकृत नियंत्रण का उपयोग करती है. इसी प्रकार से बिटकॉइन का आविष्कार सातोशी नकामोतो नाम का उपयोग करने वाले व्यक्ति या लोगों के समूह ने 2008 में किया था जिसे पहली बार 2009 में ओपन-सोर्स सॉफ्टवेयर के रूप में जारी किया गया. यही पहला विकेन्द्रीकृत क्रिप्टोक्यूरेंसी था और बिटकॉइन के आने के बाद अन्य प्रकार की क्रिप्टोकरेंसी बनाई गई हैं. फरवरी 2022 में, भारतीय संसद के बजट सत्र के दौरान वित्त मंत्री ने घोषणा की कि लोगों को क्रिप्टोकरेंसी से होने वाले मुनाफे पर 30 प्रतिशत टैक्स देना होगा और भारत ने अपना खुद का थोक सीबीडीसी या डिजिटल रुपया 1 नवंबर 2022 और रिटेल सीबीडीसी 1 दिसंबर 2022 में  लॉन्च कर दिया है.

प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि बढ़ते परमाणु ज़खीरे और रूस-युक्रेन युद्ध ने साबित कर दिया है कि विश्व शान्ति और बंधुत्व के लिए अब इन्सान को विज्ञान से ज्यादा मानविकी जैसे विषयों से उम्मीद है. वर्तमान की मानवता बारूद के ढेर पर बैठी है. अगर तीसरा विश्व युद्ध हुआ तो फिर चौथा विश्व युद्ध कभी नहीं होगा. विज्ञान ने यदि हमें युद्धों के लिए तैयार किया है तो कला और सामाजिक विज्ञान के विषय हमें शान्ति और खुशहाली के लिए तैयार करेंगे. आज का युवा अपने अनुभवों पर कम और सूचनाओं पर अधिक भरोसा करने लगा है. यही हमारी समस्याओं की जड़ है. विज्ञान और मानविकी को मानवता को बचाने के लिए आपस में सामंजस्य स्थापित करना ही होगा. यही प्रयास इस दो दिवसीय कांफ्रेंस का रहेगा कि इन्सान को एक नई दिशा दिखाई जाये.

पवन गोयल प्रधान ने स्वागत भाषण में कहा कि वर्तमान समय में बढती हिंसा एवं उन्माद, पैदा होती अजीबो गरीब लाइलाज बीमारिया, समाज और परिवारों में टूटते रिश्ते, इंसान की बढ़ती औसत आयु किन्तु गिरते स्वास्थ्य को देखकर उन्हें चिंता तो होती ही है साथ ही अहसास भी होता है कि प्राकृतिक विज्ञान कहीं न कहीं अपने रास्ते से भटक गया है. सामाजिक विज्ञान इसी दिशा में उसे सही रास्ता दिखला सकते है. हमें विज्ञान में मानवता और मानव में वैज्ञानिक दृष्टिकोण दोनों ही पैदा करने पड़ेंगे. हमारे पास पहले भी रहने के लिए सिर्फ धरती थी और आगे भी यही रहेगी. इसीलिए जो करना
है और जैसे करना है वह हमें आज ही करना होगा.

दो दिवसीय राष्ट्रीय कांफ्रेंस के सह-संयोजक प्रो अन्नू आहूजा और डॉ एसके वर्मा तथा इसके संगठन सचिव डॉ राकेश गर्ग और डॉ सुशीला बेनीवाल है. इनके साथ परामर्श समिति में डॉ नवीन गोयल, प्रो प्रवीण खेरडे, प्रो पवन सिंगला, प्रो गीता प्रुथी, डॉ संगीता गुप्ता, डॉ इंदु बाला, प्रो सविता पुनिया और डॉ भारती गुप्ता कांफ्रेंस में योगदान दे रहे है. पंजीकरण का दायित्व प्रो डेनसन डी पॉल, प्रो मनोज कुमार, प्रो आशीष गर्ग, प्रो सोनिका, प्रो विशाल गर्ग, प्रो एकता दुरेजा ने निभाया. दो दिविसीय नेशनल कांफ्रेंस में समाजशास्त्र, कानून और राजनीति, जन संचार, मनोविज्ञान, शिक्षा, इतिहास, कला और फाइन आर्ट्स, भूगोल. वाणिज्य, प्रबंधन और सूचना प्रौद्योगिकी, अंग्रेजी साहित्य और भाषा, अर्थ शास्त्र और शारीरिक शिक्षा जैसे विषयों पर गंभीर मंथन और विचार-विमर्श किया जा रहा है जिसमे प्रदेश और देश के अलग-अलग राज्यों के 600 से अधिक शोधकर्ता और प्रतिभागी भाग ले रहे है. पहले दिन 200 शोध पत्र प्रस्तुत किये गए.

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