Saturday, April 25, 2026
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निर्मला देशपांडे संस्थान में आज अक्षय तृतीया के उपलक्ष्य में एक कार्यशाला का आयोजन.


BOL PANIPAT : माता सीता रानी सेवा संस्था के अंतर्गत चल रहे निर्मला देशपांडे संस्थान में आज अक्षय तृतीया के उपलक्ष्य में एक कार्यशाला का आयोजन संस्था की महासचिव पूजा सैनी की अध्यक्षता में किया गया। जिसमें संस्था परामर्श दात्री चेतना अरोड़ा ने बाल विवाह पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह आज भी कई क्षेत्रों में चल रहा है जिसमें 18 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं का विवाह बड़ी उम्र के लोगों के साथ कर दिया जाता है। भारत में 1 नवंबर 2007 को बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 लागू हुआ। अक्टूबर 2017 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक बाल वधू के साथ यौन अपराधीकरण के बारे में एक निर्णायक निर्णय दिया, इसलिए भारत के आपराधिक न्यायशास्त्र में एक अपवाद को हटा दिया जो तब तक उन पुरुषों को कानूनी संरक्षण प्रदान करता था जिन्होंने अपनी छोटी पत्नियों के साथ बलात्कार किया था।[
पुरुष वयस्क के लिए सजा: यदि कोई वयस्क पुरुष जो 21 वर्ष से अधिक आयु का है, बाल विवाह करता है, तो उसे 2 वर्ष के लिए कठोर कारावास या एक लाख रुपये या दोनों का जुर्माना हो सकता है।
विवाह में सहायक होने के लिए दंड: यदि कोई व्यक्ति किसी भी बाल विवाह में सहायता करता है, आचरण करता है, निर्देशित करता है या उसका पालन करता है, तो उसे 2 वर्ष के कठोर कारावास या एक लाख रुपये या दोनों का जुर्माना हो सकता है।
विवाह को बढ़ावा देने / अनुमति देने के लिए सजा: बच्चे के माता-पिता या अभिभावक या कोई अन्य संगठन के सदस्य सहित कोई व्यक्ति जो बाल विवाह को बढ़ावा देने या अनुमति देने के लिए कोई कार्य करता है या लापरवाही से इसे रोकने में विफल रहता है। इस तरह के विवाह में शामिल होने या भाग लेने सहित, इसे दोषी ठहराए जाने पर 2 साल तक के कठोर कारावास या एक लाख रुपये या दोनों का जुर्माना हो सकता है।
इस अधिनियम के तहत अपराध संज्ञेय और गैर जमानती है।कार्यक्रम में बाल विवाह के नुकसान को दर्शाने वाले फिल्म भी दिखाई गई।इस अवसर पर हाली अपना स्कूल की मुख्याध्यापिका श्रीमति प्रिया लूथरा ने बोलते हुए कहा की ,बाल विवाह का सीधा असर न केवल लड़कियों पर, बल्कि उनके परिवार और समुदाय पर भी होता हैं। जिस लड़की की शादी कम उम्र में हो जाती है, उसके स्‍कूल से निकल जाने की संभावना बढ़ जाती है तथा उसके कमाने और समुदाय में योगदान देने की क्षमता कम हो जाती है। उसे घरेलू हिंसा तथा एचआईवी / एड्स का शिकार होने का खतरा बढ़ जाता है।

महासचिव पूजा सैनी ने इसका धार्मिक पक्ष रखते हुए बताया की माना जाता है कि ये प्रथा छठी सदी में शुरू हुई थी. इस प्रथा के तहत कुंवारी लड़कियों को धर्म के नाम पर ईश्वर के साथ ब्याह कराकर मंदिरों को दान कर दिया जाता था.

माता-पिता अपनी बेटी का विवाह देवता या मंदिर के साथ कर देते थे. परिवारों द्वारा कोई मुराद पूरी होने के बाद ऐसा किया जाता था. देवता से ब्याही इन महिलाओं को ही देवदासी कहा जाता है. उन्हें जीवनभर इसी तरह रहना पड़ता था. मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी देवदासी का उल्लेख मिलता है. देवदासी यानी ‘सर्वेंट ऑफ़ गॉड’. देवदासियां मंदिरों की देख-रेख, पूजा-पाठ की तैयारी, मंदिरों में नृत्य आदि के लिए थीं. कालिदास के ‘मेघदूतम्’ में मंदिरों में नृत्य करने वाली आजीवन कुंवारी कन्याओं की चर्चा की है. संभवत: इन्हें देवदासियां ही माना जाता है.

देवदासी प्रथा का सच ऐसा माना जाता रहा है कि ये प्रथा व्यभिचार का कारण बन गयी, और मंदिर के पुजारी इन देवदासियों का शोषण करते थे, और सिर्फ वही नहीं अन्य लोग जो विशेष अतिथि होते थे या मंदिर से जुड़े होते थे वो भी इन देवदासियों का शारीरिक शोषण करते थे।ज्योतिबा राव फूले ,स्वामी दयानंद सरस्वती ,राजा राम मोहन राय जैसे महापुरुषों ने नव जागरण का कार्य किया ।इस नव जागरण से महिलाओं में जागृति हुई ।कार्यशाला में प्रामर्शदात्री रेहाना खान,रोजी चावला ,श्रुति जैन, सोनी, आरती दुबे, डॉली अवस्थी आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे।

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