डॉ. सुशीला टाक भोरे – जातिवाद और भेदभाव से संघर्ष कर बनीं साहित्य की मिसाल.
BOL PANIPAT । माता सीता रानी सेवा संस्था के अंतर्गत संचालित “हाली अपना स्कूल” में रविवार को एक अत्यंत प्रेरणादायी साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि के रूप में पधारीं देश की ख्यातिप्राप्त दलित महिला साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभोरे ने अपने जीवन संघर्ष की वह प्रेरक गाथा सुनाई जो सदियों से चले आ रहे जातिवाद, लिंग भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ एक जीवंत संघर्ष की मिसाल है।
डॉ. भोरे ने बताया कि वे एक अति पिछड़े दलित परिवार में जन्मीं। गाँव में उन्हें और उनकी बहनों को स्कूल जाने से रोका जाता था। लोग कहते थे, “दलितों की लड़कियाँ क्या पढ़ेंगी?” स्त्री होना और दलित होना, दोनों ही उनके लिए दोहरा अभिशाप थे। फिर भी ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की विचारधारा से प्रेरणा लेकर उन्होंने पढ़ने का संकल्प लिया। ज्योतिबा-सावित्रीबाई ने 1848 में पुणे में देश का पहला बालिका विद्यालय खोला था और दलित-शूद्र महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था। उसी क्रांतिकारी परंपरा की कड़ी बनते हुए डॉ. भोरे ने गांव के बाहर छिप-छिप कर पढ़ाई की, मजदूरी की, और अंततः पीएच.डी. तक की पढ़ाई पूरी की।
उन्होंने कहा, “मेरी सफलता केवल मेरी नहीं, उन तमाम दलित-बहुजन महिलाओं की है जिन्हें आज भी स्कूल जाने से पहले घर के काम, बाल-विवाह और जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है।”
डॉ. भोरे ने बेबाकी से बताया कि सदियों से चली आ रही मनुस्मृति आधारित वर्ण-व्यवस्था और छुआछूत ने दलितों को शिक्षा, संपत्ति, सम्मान और अवसरों से वंचित रखा। उन्होंने कहा आज भी ग्रामीण भारत में 50% से अधिक दलित बच्चे दसवीं से पहले स्कूल छोड़ देते हैं। दलित महिलाओं की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से 20-25% कम है। उच्च शिक्षा में दलित छात्रों का प्रतिनिधित्व मात्र 8-10% है, जबकि उनकी आबादी 22% से अधिक है। नौकरियों, विशेषकर निजी क्षेत्र में, जातिगत नेटवर्किंग के कारण दलित युवा हमेशा पिछड़ जाते हैं। दलित महिलाएं ट्रिपल उत्पीड़न झेलती हैं : जाति, लिंग और वर्ग का।
इन सबके पीछे मूल कारण है हजारों वर्ष पुरानी ब्राह्मणवादी व्यवस्था जिसे 19वीं सदी में कुछ महान समाज सुधारकों ने चुनौती दी।
देश में सबसे पहले दलित-शूद्र और महिलाओं के लिए स्कूल खोलने वाले युगदृष्टा ज्योतिबा ने “गुलामगिरी” पुस्तक में ब्राह्मणवाद की जड़ें उखाड़ कर रख दीं। सावित्रीबाई को लोग पत्थर मारते थे, गोबर फेंकते थे, फिर भी वे दलित बालिकाओं को पढ़ाने जाती थीं। आज डॉ. सुशीला टाक भोरे जैसी लाखों महिलाएं उन्हीं की देन हैं।
स्वामी दयानन्द ने “सत्यार्थ प्रकाश” में वर्ण-व्यवस्था को जन्म पर नहीं, कर्म पर आधारित बताया और शुद्धि आंदोलन चलाकर हजारों दलितों-आदिवासियों को वापस हिंदू समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाया। आर्य समाज के स्कूलों ने दलित बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी।
सती प्रथा पर रोक, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन और आधुनिक शिक्षा की स्थापना करने वाले राजा राम मोहन राय ने ही अंग्रेजी शिक्षा के दरवाजे खोले जिससे बाबासाहेब आंबेडकर जैसे महामानव आगे आए।
गांधीजी ने हरिजन सेवक संघ बनाया, दलितों को मंदिर प्रवेश दिलाया और “हरिजन” शब्द देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया। यद्यपि बाबासाहेब आंबेडकर से उनके कुछ मतभेद रहे, पर गांधीजी ने छुआछूत को हिंदू धर्म का कलंक बताया और जीवन पर्यंत इसके खिलाफ संघर्ष किया।
विद्यालय की प्रधानाचार्या पूजा सैनी ने डॉ. सुशीला टाक भोरे को शॉल, स्मृति चिह्न एवं पौधा भेंट कर सम्मानित किया। संस्था की अध्यक्ष कृष्ण कांता राय, निदेशक राम मोहन राय, मधु यादव, कंचन डावर, सोनू त्यागी सहित सैकड़ों विद्यार्थी एवं अभिभावक उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में डॉ. भोरे ने बच्चों से कहा, “तुम्हारी जाति, तुम्हारी नियति नहीं है। ज्योतिबा-सावित्रीबाई, राजा राम मोहन राय, स्वामी दयानंद और बाबासाहेब आंबेडकर ने जो सपना देखा था, उसे तुम्हें पूरा करना है। पढ़ो, संघर्ष करो और समाज को बदलो।”
इस आयोजन ने न केवल विद्यार्थियों अपितु पूरे पानीपत शहर को यह संदेश दिया कि जाति और लिंग के बंधन तोड़कर भी इंसान आसमान छू सकता है, बशर्ते उसके भीतर ज्योतिबा-सावित्रीबाई और आंबेडकर का जज्बा जिंदा हो।

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