धान की सीधी बिजाई से बदलेगी खेती की तस्वीर. किसानों को मिलेगा 4500 रुपये प्रति एकड़ अनुदान उपायुक्त डॉ विरेंदर कुमार दहिया.
जल संरक्षण और कम लागत वाली खेती की दिशा में बड़ा कदम, किसान उठाएं योजना का लाभ
भूजल बचाने का संकल्प, समृद्ध किसान का लक्ष्य—धान की सीधी बिजाई योजना बनी वरदान
समय, पानी और मेहनत की बचत के साथ बढ़ेगी किसानों की आय, 15 जून तक कराएं पंजीकरण
धान की सीधी बिजाई योजना किसानों के लिए लाभकारी पहल
BOL PANIPAT , 4 जून। उपायुक्त डॉ. विरेंदर कुमार दहिया ने किसानों से आह्वान किया है कि वे हरियाणा सरकार की धान की सीधी बिजाई (डीएसआर) योजना का अधिक से अधिक लाभ उठाएं। यह योजना न केवल किसानों की खेती की लागत कम करती है बल्कि भूजल संरक्षण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।
उपायुक्त ने बताया कि खरीफ सीजन 2026 के लिए प्रदेश सरकार द्वारा धान की सीधी बिजाई योजना को लागू किया गया है। योजना के तहत धान की सीधी बिजाई करने वाले किसानों को भौतिक सत्यापन के उपरांत 4500 रुपये प्रति एकड़ का प्रोत्साहन अनुदान प्रदान किया जाएगा। इसके लिए किसानों का मेरी फसल-मेरा ब्यौरा पोर्टल पर पंजीकरण करवाना अनिवार्य है।
डॉ. दहिया ने कहा कि पारंपरिक धान रोपाई की तुलना में सीधी बिजाई तकनीक से किसानों को अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। इससे खेतों में पानी की खपत कम होती है, श्रमिकों पर निर्भरता घटती है तथा समय और लागत दोनों की बचत होती है। उपायुक्त ने कहा कि वर्तमान समय में गिरते भूजल स्तर को देखते हुए जल संरक्षण अत्यंत आवश्यक है और धान की सीधी बिजाई इस दिशा में प्रभावी समाधान बनकर उभरी है।
उपायुक्त ने कहा कि हरियाणा सरकार किसानों की आय बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत है। आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाकर किसान अपनी खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बना सकते हैं। उपायुक्त डॉ विरेंदर कुमार दहिया ने किसानों से अपील की कि वे योजना का लाभ लेने के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर अपना पंजीकरण अवश्य करवाएं।
उन्होंने बताया कि योजना के लिए पंजीकरण की अंतिम तिथि 15 जून निर्धारित की गई है। जिला प्रशासन एवं कृषि विभाग द्वारा किसानों को योजना संबंधी सभी आवश्यक जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है ताकि अधिक से अधिक किसान इस जनहितकारी योजना से जुड़ सकें।
उपायुक्त डॉ. विरेंदर कुमार दहिया ने कहा कि धान की सीधी बिजाई केवल एक कृषि तकनीक नहीं, बल्कि जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और किसान समृद्धि का सशक्त माध्यम है। किसानों द्वारा इस तकनीक को अपनाना आने वाली पीढिय़ों के लिए जल संसाधनों को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान होगा।

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