“छात्रों की आवाज़ को सुनना ही लोकतंत्र की सच्ची परीक्षा है” : एडवोकेट निखिल चुघ
BOL PANIPAT : अधिवक्ता, लेखक एवं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य निखिल चुघ का मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक मजबूती केवल उसके कानूनों से नहीं, बल्कि उन कानूनों के निष्पक्ष, पारदर्शी और जवाबदेह क्रियान्वयन से मापी जाती है। संवैधानिक कानून, नागरिक अधिकारों और जनहित से जुड़े विषयों पर सक्रिय रूप से अपनी कानूनी राय रखने वाले एडवोकेट चुघ का कहना है कि जब देश का युवा अपने भविष्य, शिक्षा और रोजगार को लेकर चिंता व्यक्त करता है, तब उसकी आवाज़ को गंभीरता से सुनना लोकतांत्रिक शासन की जिम्मेदारी बन जाती है।
छात्रों का विरोध केवल आंदोलन नहीं, व्यवस्था में विश्वास की मांग है :
20 जुलाई को देशभर में बड़ी संख्या में छात्र अपनी विभिन्न मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे। कई स्थानों पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव तथा बल प्रयोग की घटनाएँ भी सामने आईं। किसी भी ऐसी घटना का मूल्यांकन केवल कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि यह भी समझना आवश्यक है कि आखिर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न क्यों हुईं।
एडवोकेट निखिल चुघ का कहना है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण एवं अहिंसक तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। यदि हजारों छात्र किसी परीक्षा प्रणाली, भर्ती प्रक्रिया या प्रशासनिक निर्णय को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं, तो लोकतंत्र की भावना यही कहती है कि उनकी बात को सुना जाए, समझा जाए और उसका पारदर्शी समाधान प्रस्तुत किया जाए।
उन्होंने कहा कि आज देश का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, बल्कि विश्वसनीय संस्थाएँ, निष्पक्ष प्रक्रियाएँ और जवाबदेह प्रशासन चाहता है। जब किसी व्यवस्था पर व्यापक स्तर पर प्रश्न उठते हैं, तब उन प्रश्नों का उत्तर बल प्रयोग नहीं, बल्कि तथ्यों, संवाद और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में असहमति राष्ट्रविरोध नहीं, सुधार का माध्यम है:
एडवोकेट चुघ का मानना है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह नागरिकों को सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार देता है। यदि देश का विद्यार्थी वर्ग अपने भविष्य, शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर चिंतित है, तो उनकी चिंताओं को विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा माना जाना चाहिए। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार जनता और विशेषकर युवाओं की आवाज़ सुनने के बाद ही लागू हुए हैं।
उन्होंने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार की परिपक्वता इस बात से मापी जाती है कि वह आलोचना और असहमति का उत्तर संवाद से देती है या टकराव से। लोकतंत्र में जनता प्रश्न पूछती है और संस्थाएँ उत्तर देती हैं—यही संवैधानिक संस्कृति की पहचान है।
पारदर्शिता और जवाबदेही से ही मजबूत होगा जनविश्वास:
एडवोकेट निखिल चुघ के अनुसार यदि किसी परीक्षा, भर्ती प्रक्रिया या सार्वजनिक निर्णय को लेकर व्यापक स्तर पर संदेह या असंतोष उत्पन्न होता है, तो संबंधित संस्थाओं का दायित्व बनता है कि वे समयबद्ध, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से तथ्यों को सार्वजनिक करें। स्वतंत्र जांच, स्पष्ट जवाबदेही और आवश्यक सुधार केवल प्रशासनिक औपचारिकताएँ नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की मूल आवश्यकताएँ हैं।
उन्होंने कहा कि जब जनता को यह विश्वास होता है कि उसकी शिकायतों की निष्पक्ष सुनवाई होगी और त्रुटियों को स्वीकार कर उनमें सुधार किया जाएगा, तब संस्थाओं की विश्वसनीयता और लोकतंत्र दोनों मजबूत होते हैं।
न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, होता हुआ भी दिखाई देना चाहिए:
एडवोकेट चुघ ने कहा कि न्याय व्यवस्था का एक स्थापित सिद्धांत है कि “न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए।” यही सिद्धांत प्रशासनिक निर्णयों और सार्वजनिक संस्थाओं पर भी समान रूप से लागू होता है। यदि युवाओं के मन में किसी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर संदेह उत्पन्न हो जाए, तो उस संदेह को दूर करना राज्य का दायित्व है। पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास की आधारशिला हैं।
युवाओं की आवाज़ भविष्य की आवाज़ है:
उन्होंने कहा कि देश का विद्यार्थी केवल अपने लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर व्यवस्था की मांग करता है। यदि उसकी मांगें निष्पक्षता, पारदर्शिता, समान अवसर और जवाबदेह शासन से जुड़ी हैं, तो उन्हें संवेदनशीलता और गंभीरता से सुना जाना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके युवाओं के विश्वास पर निर्भर करती है, और वह विश्वास तभी कायम रहता है जब शासन व्यवस्था निष्पक्ष, पारदर्शी और न्यायसंगत दिखाई दे।
अंत में एडवोकेट निखिल चुघ ने कहा कि “मजबूत लोकतंत्र वही है जहाँ छात्र निर्भय होकर अपनी बात रख सकें, सरकार संवेदनशील होकर उन्हें सुन सके और संस्थाएँ निष्पक्ष होकर उत्तर दे सकें। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की आवाज़ को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सम्मानपूर्वक सुनकर व्यवस्था को और अधिक न्यायपूर्ण बनाने में निहित है।”

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