Friday, July 17, 2026
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जिसका चरित्र खराब हो न उसके पास बैठना चाहिए, न उसकी वाणी सुननी चाहिए : स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज (मुरथल वाले)


BOL PANIPAT : श्री संत द्वारा हरि मन्दिर, निकट सेठी चौक, पानीपत के प्रांगण में नव विक्रमी सम्वत 2083 के उपलक्ष्य के अवसर पर परम पूज्य 1008 स्वामी दयानन्द सरस्वती जी महाराज (मुरथल वाले) की अध्यक्षता में चार दिवसीय संत समागम कार्यक्रम के तीसरे दिन महाराज श्री ने प्रवचन करते हुए कहा कि यदि हमें मंजिल पर पहुँचना है तो सबसे पहले प्रथम सीढ़ी पर पांव रखते हैं क्योंकि यदि एकदम से आखिरी सीढ़ी पर पांव रखने की कोशिश करेंगे तो गिर जायेंगे। इसी प्रकार परमात्मा को पाने की पहली सीढ़ी है मानस यानि मन, रामचरितमानस में भी लिखा है ‘‘निर्मल जन सो मोही पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा’’ जिसका मानस ठीक हो जायेगा उसका चरित्र ठीक हो जायेगा। जिसका चरित्र खराब हो न उसके पास बैठना चाहिए, न उसकी वाणी सुननी चाहिए। मन ठीक हो गया तो चरित्र ठीक हो जायेगा और चरित्र ठीक हो गया तो चरित्र के बाद राम हैं। राम जी मिल गए तो राम जी के बाद श्री है यानी लक्ष्मी और इन तीनों का समन्व्य हो जायेगा। राम जी आ गए तो लक्ष्मी जी पीछे पीछे भागेंगी। एक बार भगवान विष्णु और लक्ष्मी में वार्ता हुई कि कौन श्रेष्ठ है। लक्ष्मी माता ने कहा कि यह देखिए पृथ्वीलोक में किसी की अर्थी जा रही है। लक्ष्मी माता ने रास्ते में सोने के सिक्कों की बरसात कर दी। सब लोग अर्थी को जमीन पर रखकर अपनी जेबें अशर्फियों से भरने लगे यह देखकर लक्ष्मी माता ने भगवान विष्णु से कहा कि आपने मेरा प्रभाव देखा। इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि देवी देखो जो अर्थी पर पड़ा है वह खड़ा होकर अशर्फियां नहीं ले रहा अर्थात जिसमें मैं यानी आत्मा जा चुका वह श्री का भी सम्मान नहीं कर सकता। इससे पूर्व गुरविन्द्र शाह साहिब जी ने गुरबाणी के माध्यम से आई हुई संगतों को निहाल किया। उन्होंने अपने प्रवचनों में कहा कि रात्रि में कुछ लोग एक नांव पर बैठे और अन्धेरे में चप्पू चलाने लगे वे पूरी रात चप्पू चलाते रहे लेकिन किनारा नहीं आया प्रभात का हल्का प्रकाश होने पर उन्होंने जाना कि हमने किश्ती तो किल्ले से बंधी धी और वो रस्सी खोली ही नहीं वैसे ही व्यक्ति धर्म का चप्पू तो चलाता है लेकिन पाप रूपी रस्सी को खोलता ही नहीं, जिससे वो परमात्मा तक पहुँच ही नहीं पाता। इस अवसर ब्रह्मर्षि श्रीनाथ जी महाराज, प्रधान रमेश चुघ, पवन चुघ, हरनाम चुघ, उत्तम आहूजा, ईश्वर लाल रामदेव, किशोर रामदेव, दर्शन रामदेव, अमन रामदेव, धर्मवीर नन्दवानी, ओमी चुघ, मोहन लाल जुनेजा, कर्म सिंह रामदेव, गोल्डी बांगा, अमर वधवा, सुरेन्द्र जुनेजा, हरनारायण जुनेजा, अमर सपड़ा, जयदयाल तनेजा, सतीश रेवड़ी, सतपाल जुनेजा, रामलाल जुनेजा, श्याम लाल सपड़ा, सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे।

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