Tuesday, February 10, 2026
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अंगदान हमारी महानता का सूचक है : डॉ एसएन गुप्ता

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at February 18, 2022 Tags: , ,

एसडीपीजी कॉलेज में कुरुक्षेत्र विश्वविधालय एनएसएस विशेष कैंप का चौथा दिन

तार्किक, व्यावहारिक, व्यवस्थित दृष्टिकोण एवं वैज्ञानिक विश्लेषण अच्छेफॉरेंसिक एक्सपर्टके गुण: डॉ नीलम आर्य

BOL PANIPAT : एसडीपीजी कॉलेज में कुरुक्षेत्र विश्वविधालय एनएसएस पाठ्यक्रम के अनुसार आयोजित सात दिवसीय एनएसएस विशेषकैंप के चौथे दिन गेस्ट ऑफ़ ऑनर एसडी पीजी कॉलेज पूर्व-प्रधान और वरिष्ठशल्य चिकित्सक डॉ एसएन गुप्ता ने अंगदान के महत्त्व और इसके फायदों के बारे में कार्यकर्ताओं को विस्तार से बताया.उन्होनेंअंगदानको व्यक्ति की महानता का सूचक बताया.डॉ नीलम आर्य वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी, फॉरेंसिक विभाग मधुबन करनाल ने फॉरेंसिक साइंस को अपराध से जुड़ा विज्ञान बताया. श्रीमतीरोहिणीफर्स्ट ऐड एवं नर्सिंग टीचर सैंट जॉन एम्बुलेंस इंडियन रेड क्रॉस पानीपत ने आपातकालीन स्थिति में फर्स्ट ऐड देने के नुस्खे एनएसएस कार्यकर्ताओं को समझाए.माननीय मेहमानों का स्वागत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, कॉलेज एनएसएस प्रभारी डॉ राकेश गर्ग एवंडॉ संतोष कुमारी नेपुष्प-पौधे रोपित गमले भेंट कर किया. इस अवसर पर एनएसएस कार्यकर्ताओं ने ग्राम काबड़ी जाकर ग्रामीणों को जल एवं वन संरक्षण कामहत्त्व समझाया और उन्हें जागरूक बनाया.

गेस्ट ऑफ़ ऑनर पूर्व-प्रधान एवंवरिष्ठचिकित्सकडॉ एसएन गुप्ता ने कहा कि व्यक्तिमरने के बाद भी किसी इंसान को नया जीवन दे सकते हैं और उनके चेहरे पर फिर से मुस्कान ला सकते हैं. हम फिर से किसी को यह दुनिया दिखा सकते हैं. अंगदान करने से हममें एक महान शक्ति पैदा होती है और यह शक्तिअदभुत होती है. इस तरह की उदारता मन की महानता की धोतकहैजो न केवल हमको बल्कि दूसरोंको भी खुशी देती है. भारत में हर वर्ष लगभग पांचलाख लोग अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करते हैं. प्रत्यारोपण की संख्या और अंग उपलब्ध होने की संख्या के बीच आज भी एक बड़ा फासला है. अंगदान ऐसी प्रक्रिया है जिसमें अंगदाता अंग ग्राही को अंगदान करता है. दाता जीवित या मृत दोनों हो सकते है. दान किए जा सकने वाले अंग गुर्दे, फेफड़े, दिल, आंख, यकृत, पैनक्रियस, कॉर्निया, छोटी आंत, त्वचा के ऊतक, हड्डी के ऊतक, हृदय वाल्व और नसे हैं.इस तरह देखा जाए तो एक व्यक्ति कई व्यक्तियों की जान बचा सकता है. अंगदान जीवन के लिए अमूल्य उपहार है और अंगदान उन व्यक्तियों को किया जाता हैजिनकी बीमारियाँ अंतिम अवस्था में होती हैं तथा जिन्हें अंग प्रत्यारोपण की शीघ्र आवश्यकता होती है.भारत में दो लाख व्यक्ति लीवर की बीमारी और पचास हजार व्यक्ति हृदय की बीमारी के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं. इसके अलावालगभग एक लाख पचास हजार व्यक्ति गुर्दा प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा करते हैंजिनमें से केवल पांच हजार व्यक्तियों को ही गुर्दा मिलपाताहै. अंगदान की बड़ी संख्या में जरूरत होते हुए भी भारत में हर दस लाख में सिर्फ 0.08 डोनर ही अपना अंगदान करते हैं. भारत के मुकाबले अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी में 10 लाख में 30 डोनर और सिंगापुर, स्पेन में हर 10 लाख में 40 डोनर अंगदान करते हैं. इस मामले में दुनिया के कई देशों के मुकाबले भारत काफी पीछे है और इसकी बड़ी वजह जागरूकता का अभावहोना है. लाखों व्यक्ति अपने शरीर के किसी अंग के खराब हो जाने पर उसकी जगह किसी के दान किये अंग का इन्तजारकरते रह जाते हैं. ऐसे व्यक्ति अभी भी जीना चाहते हैंलेकिन उनके शरीर का कोई अंग अवरूद्ध हो जाने से उनकी जिन्दगी खतरे में आ जाती है. अंग प्रतिरोपित व्यक्ति के जीवन में अंगदान करने वाला व्यक्ति एक ईश्वर की भूमिका निभाता है. अपने अच्छे क्रियाशीलअंगों को दान करने के द्वारा कोई अंगदाता आठसे ज्यादा लोगों के जीवन को बचा सकता है. उन्होनें हर एनएसएस कार्यकर्ताओ को कहा कि वे अपने जीवन में आगे बढ़े और अंगदान जैसे पुनीत कार्य के महत्त्व को ग्रामीणोंतक पहुंचाएं. ज्ञान के अभाव में ग्रामीण आज भी अंगदान करने से डरते है और गलत भ्रांतियों के कारण इससे गुरेज करते है.

डॉ नीलम आर्य वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी, फॉरेंसिक विभाग मधुबन करनालने कहा की फॉरेंसिक साइंस अपराध से जुड़ा विज्ञान है और इसमें अपराध का पता लगाने के लिए शरीर केतरल पदार्थो की जांच की जाती है. फॉरेंसिक रिपोर्ट को अदालत भी अहम प्रमाण मानती है. देश-विदेश में बढ रही आतंकी घटनाओं और अपराधों ने फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मांगबढा दी है. आपराधिक वारदातों के सूत्रधारों की धर-पकड के लिए प्रशिक्षित सुरक्षा बलों की जरूरत आज समाज और समय की मांगहै. इस साइंस का जानकार अपराध से जुडे लोगों को पकडवाने में काफी मददगार होता है. आतंकवादी गुत्थियां हों या रहस्यमय मौत, इसे सुलझाने में फॉरेंसिक साइंस की अहम भूमिका होती है. फॉरेंसिक साइंस अब विदेश में ही नहींदेश में भी लोकप्रिय होती जा रही है.इस क्षेत्र में बढती नौकरियों ने विद्यार्थियोंको फॉरेंसिक साइंस का कोर्स करने के लिए प्रेरितकियाहै. इसकी पढाई करने वालों के लिए नौकरियोंके कई विकल्पहैं. इसमें डिप्लोमा कोर्स से लेकर पीएचडी करने वालोंके लिए हर स्तर पर नौकरी के अवसर है. एक अच्छे फॉरेंसिक एक्सपर्टका स्वभाव जिज्ञासु, उसकी कानून-व्यवस्था पर आस्था, उसमेसटीकता का गुण,तार्किक, व्यावहारिक,व्यवस्थित दृष्टिकोण तथाउसमेवैज्ञानिक विश्लेषण की क्षमता होनी चाहिए.फॉरेंसिक साइंस में प्राप्त शिक्षा के आधार पर हमअध्यापक,फॉरेंसिक इंजीनियर, जेनेटिक एक्सपर्ट, फॉरेंसिक साइकोलॉजिस्ट, फॉरेंसिक साइंटिस्ट, फॉरेंसिक इंवेस्टिगेटर, सिक्योरिटी एक्सपर्ट, फॉरेंसिक कंसलटेंट, डिटेक्टिव आदि महत्वपूर्ण पदों पर नौकरियां पा सकते है. एनएसएस कार्यकर्ताओं को इस की जानकारी गाँव में रहने वाले युवाओं तक पहुंचानी चाहिए ताकि वे भी इसमें उपलब्ध रोजगार के अवसरों का फायदा उठा सके.

श्रीमती रोहिणी फर्स्ट ऐड एवं नर्सिंग टीचर सैंट जॉन एम्बुलेंस इंडियन रेड क्रॉस पानीपतने व्यावहारिक प्रशिक्षण देते  हुए कहा की किसी भी बीमारी,चोट या दुर्घटना के लिये चिकित्सक या ऐम्बुलेंस आने से पहले जो राहतकार्य और उपचारकिया जाता है उसे ही प्राथमिक सहायता कहते हैं. इस उपचार के दौरान उपयोग मे आने वाले साधनों के संग्रह को फर्स्ट ऐड किट कहते हैं. फर्स्ट ऐड के तीन महत्वपूर्ण उद्देश्य होते हैं – जीवनसंरक्षण प्राथमिक उपचार का सबसे मुख्य उद्देश्य है क्यूंकि इसमें मरीज़, बीमार या घायल व्यक्ति के जीवनकी रक्षा करना होता है. दूसरा कदम स्थिति को अधिक खराब होने सेबचाना है.इसके लिये बाहरी और आंतरिक स्थिति को नियंत्रण मे रखना आवश्यक है. इसलियेबाहरी तौर पर मरीज़ या घायल व्यक्ति को उसके कष्ट या पीडा के कारण की स्थिति से दूर ले जाना होता है और आंतरिक तौर पर उसकी शारीरिक और मानसिक अवस्था कोबिगडने से  बचाया जाना शामिल है. रोग-मुक्त होने मे सहायता करना फर्स्ट ऐड का तीसरा कदम है. रोगी कोदवाई और मरहम-पट्टी दे कर उसे निरोगी और पूर्णतः स्वस्थ करना फर्स्ट ऐड का अंतिमउद्देश्य है. प्राथमिक उपचार शुरु करने पर सबसे पहले मरीज़ या घायल व्यक्ति की जाँच के लिये इन तीन चीज़ो को अहमियत दी जानी चाहिए जिसे संक्षेप मे फर्स्ट ऐड की एबीसी के नाम से जाना जाता है. हरएनएसएस कार्यकर्ता को फर्स्ट ऐड देने का ज्ञान अवश्य होना चाहिए.

प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि कोई भी व्यक्ति चाहेवह किसी भी उम्र, जाति, धर्म और समुदाय का हों अंगदान कर सकता है. यह धारणा भी देखने को मिलती है कि बुजुर्ग अंगदान नहीं कर सकते. लेकिन सच यह है कि 18साल के बाद कोई भी नागरिक अंगदान कर सकता है. संसार में मनुष्य जन्म से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है और मनुष्य को ही संसार में ईश्वर का प्रतिनिधि माना गया है. वही दया, संवेदना एवं धर्म का मूर्तिमान रूप है और इस धरती का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है. इंसान ही जीवन एवं मृत्यु के संघर्ष में जूझ रहे व्यक्ति को अपने अंगदान से नया जीवन देने का सामर्थ्य रखता है.

एनएसएस प्रोग्राम ऑफिसर डॉ राकेश गर्ग ने कहा कि कोई भी इंसान दुनिया से जातेवक्त कई लोगों को जिंदगी दे सकता है परन्तु देश में इस महादान को लेकर कई मिथक एवं गलत धारणाएं प्रचलित हैं जिन्हें दूर करना बहुतजरूरी है. अंगदान को लेकर लोगों के मन में क्या भ्रांतियां होती हैं इसे डॉ एसएन गुप्ता जैसे विशेषज्ञ ही बता और समझा सकते है.

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