सतगुरू शरण हमें जन्म मरण के बंधन से छुटकारा दिलाती है।
BOL PANIPAT : 11 फरवरी,आज प्रातःकाल के सत्र में साध्वी मिनाक्षी दीदी द्वारा संगीतमय गुरूदेव जी के गुणगान से प्रारंभ हुआ। इसके साथ ही श्रीकृष्ण भगवान की लीलाओं का वर्णन करके सारी संगत को भावविभोर कर दिया। भजन के माध्यम से होली खेली गई तथा सबको राधा नाम के संकीर्तन पर सबको झूमने पर विवश कर दिया।
सायंकाल के पहले सत्र में भगवतधाम से पधारे परम श्रद्धेय महामण्डलेश्वर डाक्टर स्वामी विवेकानन्द जी ने गुरूभक्ति की व्याख्या की। गुरू शब्द स्वयं में इतना शक्तिशाली है कि शिष्य द्वारा आत्मसात करने पर बारम्बार जन्म लेने से छुटकारा पा सकता है। दुविधा यह है कि ईश्वर की माया में व्यक्ति इतना आसक्त है कि गुरूमंत्र लेने के पश्चात भी उनका कल्याण नहीं होता। कारण यह है कि यह माया से अनासक्त नहीं हो पाता। उन्होंने कबीरदास जी के उपदेश को दोहराया कि ‘‘’माया मरी न मन मरा मर गये शरीर आशा तृष्णा न मरी कह गये दास कबीर’। अन्तःकरण की शुद्धि विकारों जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या आदि से पूर्णतया नियन्त्रण करने पर ही संभव है। भगवान स्वयं अपनी लीला में गुरूसेवा का अवसर मिलते ही गुरूचरनों की सेवा करने में देर नहीं लगाते। भगवान सेवा करते हुए स्पष्ट सन्देश दे रहे हैं कि मानव जीवन में कुछ बनने के लिए बाकी बातों से गुरूसेवा उत्तम सेवा है। मनुष्य को दूसरे काम के साथ साथ भगवान की बनाई हुई सृष्टि के हर जीव के साथ प्रेम का व्यवहार करना आवश्यक हे।
श्री प्रेम मन्दिर की परमाध्यक्षा जी ने भी अपने आशीर्वाद व प्रवचनों से आई संगत को सत्संग श्रवण के साथ साथ मनन व अमल करने पर भी बल दिया। जिस प्रकार बिमारी में केवल डाक्टर से दवा लेने पर लाभ नहीं होता परन्तु उसको खाने के साथ परहेज भी जरूरी है। तभी यह दवा लाभकारी होती है।
इस अवसर पर दिल्ली, कामा, बहादुरगढ़, झज्जर, मैनपुरी, प्रयागराज, हलद्वानी आदि विभिन्न स्थानों से गुरूभक्तों ने आकर उत्सव में उपस्थिति देकर अपने जीवन को सफल बनाया।

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