Sunday, April 19, 2026
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एसडी पीजी कॉलेज पानीपत के एनएसएस स्वयंसेवकों ने गंभीर भाव के साथ मनाया अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस.

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL , at June 6, 2024 Tags: , , , ,

-‘पेड़ लगायें, पर्यावरण को बचाएँ’ विषय को लेकर पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता, जागरूकता रैली और सेमिनार का आयोजन
-अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस का उद्देश्य पर्यावरण के साथ सदभाव में रहना और इसकी सुरक्षा के प्रति सभी की चेतना को जागृत करना है: डॉ अनुपम अरोड़ा

BOL PANIPAT , 05 जून, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाइयों के स्वयंसेवकों ने  अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस को पर्यावरण जागरूकता और ‘पेड़ लगायें पर्यावरण को बचाएं’ के उदेश्य के भाव के साथ मनाया । कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा और एनएसएस प्रोग्राम ऑफिसर डॉ राकेश गर्ग ने की । इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण और इसकी सुरक्षा को लेकर सेमीनार का आयोजन किया गया जिसे प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने संबोधित किया । विदित रहे कि विश्व पर्यावरण दिवस 2024 का थीम ‘भूमि बहाली, मरुस्थलीकरण और सूखा सहनशीलता’ है । युवाओं में पर्यावरण बचाने की अलख जगाने हेतू और उन्हें संवेदनशील नागरिक बनाने के उद्देश्य से कॉलेज प्रांगण में मेगा वृक्षारोपण ड्राइव भी चलाई गई जिसमे विभिन्न प्रकार के फलदार और छायादार पौधे स्वयंसेवकों ने अपने घर और आस-पास लगाये । तत्पश्चात पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसका विषय ‘पेड़ लगायें, पर्यावरण को बचाएँ’ रहा और इसमें छात्र सौरभ ने प्रथम स्थान हासिल किया । दूसरा स्थान पूजा को और तीसरा स्थान अर्पिता ने हासिल किया । हाथ में बैनर और पलाकार्ड्स उठाये हुए एनएसएस कार्यकर्ताओं ने पर्यावरण जागरूकता रैली निकाली और ‘जिस दिन पृथ्वी में पर्यावरण नहीं होगा, उस दिन पृथ्वी में जीवन भी नहीं होगा’, ‘जहाँ न पेड़-पौधे हैं, न चिड़िया है, न हरियाली है, वहाँ जीवन केवल एक बोझ है’, ‘जब तक मानव अपना कर्तव्य नहीं समझेगा, तब तक पर्यावरण पर खतरा मंडराता हीं रहेगा’ जैसे नारों से कॉलेज में सम्पूर्ण माहौल पर्यावरण को लेकर संजीदा नजर आया । इस अवसर पर प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने पर्यावरण को बचाने और पदों को लगाने की शपथ सभी एनएसएस कार्यकर्ताओं और स्टाफ सदस्यों को दिलाई ।
दिनेश गोयल कॉलेज प्रधान ने कहा कि हमें अपने चारों ओर के वातावरण को संरक्षित करने का तथा उसे जीवन के अनुकूल बनाए रखने का प्रयास निरंतर करना होगा । पर्यावरण और प्राणी एक दूसरे पर आश्रित हैं और यही कारण है कि भारतीय चिन्तन में पर्यावरण संरक्षण की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना यहाँ की मानव जाति का इतिहास है । पर्यावरण संरक्षण का समस्त प्राणियों के जीवन तथा इस धरती के समस्त प्राकृतिक परिवेश से घनिष्ठ सम्बन्ध है । बढ़ते प्रदूषण के कारण सारी पृथ्वी दूषित हो रही है और यदि इसे अब भी रोका न गया तो उन्हें भविष्य में मानव सभ्यता का अंत होता दिखाई दे रहा है ।
प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस का उद्देश्य पर्यावरण के संरक्षण और सुरक्षा के प्रति सभी की चेतना को जागृत करना है । अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस प्रति वर्ष 5 जून को मनाया जाता है और इसे पहली बार संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में 5 जून 1974 को मनाया गया । इसके बाद से हर साल विश्व पर्यावरण दिवस को मनाया जा रहा है । इसका मुख्य उद्देश्य लोगों के मन में पर्यावरण के संरक्षण और सुरक्षा के प्रति चेतना को जागृत करना है । अगर हमने पर्यावरण में संतुलन बनाए रखा होता और इसका अर्थहीन दोहन न किया होता तो शायद कोरोना और अन्य महामारियों के हालात धरती पर न पैदा हुए होते । प्रकृति ने हमे बार-बार चेतावनी देती है कि हम उससे अनवांछित छेडछाड़ न करे और उसके साथ भी उचित व्यवहार करे । हमें एक ही धरती मिली है और हमें ही इसका ख्याल रखना होगा । अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस का उद्देश्य पर्यावरण के साथ सदभाव में रहना और इसकी सुरक्षा के प्रति सभी की चेतना को जागृत करना है ।
डॉ राकेश गर्ग एनएसएस प्रोग्राम ऑफिसर ने कहा कि मरुस्थलीकरण ज़मीन का क्षरण है, जो शुष्क और अर्द्ध-नम क्षेत्रों में विभिन्न कारकों की वजह से होता है जिनमें विविध जलवायु और मानवीय गतिविधियां भी शामिल है । मरुस्थलीकरण मुख्यतः मानव निर्मित गतिविधियों के परिणाम स्वरूप होता है, विशेष तौर पर ऐसा अधिक चराई, भूमिगत जल के अत्यधिक इस्तेमाल और मानवीय एवं औद्योगिक कार्यों] के लिए नदियों के जल का रास्ता बदलने की वजह से है । यह सारी प्रक्रियाएं मूलतः अधिक आबादी की वजह से संचालित होती हैं । मरुस्थलीकरण का सबसे गहरा प्रभाव जैव विविधता और उत्पादक क्षमता में कमी आना होता है । उदाहरण के लिए संक्रमण से झाड़ियों से भरे ज़मीनों के गैर देशीय चरागाह में तब्दील होना. उदाहरण के लिए, कई तटीय वृक्षों और झाड़-झंखाड़ों वाले पारितंत्रों की जगह नियमित अंतराल पर आग की वापसी से गैर देशीय, आक्रामक घास का भर जाना । इसकी वजह से वार्षिक घास की ऐसी श्रृंखला पैदा हो सकती है जो कभी मूल पारितंत्र में पाये जाने वाले जानवरों को सहारा नहीं दे सकती है ।  हालात अब बहुत खतरनाक स्तर तक पहुँच चुके है और हमें पर्यावरण को बचाना ही होगा ।
डॉ एसके वर्मा ने कहा कि आज पर्यावरण को लेकर हालात बेहद चिंताजनक है और यदि इस पर अभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो मानव जाति का जीवित रहना ही मुश्किल हो जायेगा । ग्लोबल वार्मिंग के कारण लगातार ग्लेसियर पिघल रहे हैं जिसकी वजह से समुद्र में जल का स्तर बढ़ रहा है । यदि सब ऐसे ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब धरती के ज्यादातर शहर जलमग्न हो जायेंगे ।
सेमिनार में डॉ राकेश गर्ग, डॉ पवन कुमार, दीपक मित्तल, चिराग सिंगला समेत प्राध्यापकों एवं लगभग 150 स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया ।

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