Monday, May 18, 2026
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एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में  थैलेसीमिया  वेलफेयर सोसाइटी पानीपत और राष्ट्रीय सेवा योजना के संयुक्त तत्वाधान में मेगा नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन

By LALIT SHARMA , in EDUCATIONAL SOCIAL , at December 15, 2024 Tags: , , , , ,

थैलेसीमिया से लड़ने और इसके इलाज के लिए सरकार हर संभव सहायता कर रही है: डॉ अनुपम अरोड़ा  

BOL PANIPAT , 15 दिसम्बर, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत में थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी पानीपत और कॉलेज एनएसएस यूनिट्स के संयुक्त मेगा नि:शुल्क स्वास्थ्य जांच शिविर का आयोजन किया गया जिसमे थैलेसीमिया के 70 मरीजों के साथ कॉलेज की एनएसएस यूनिट्स के स्वयंसेवकों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया । कार्यक्रम में बतौर अति-विशिष्ट अतिथि डॉ जेएस अरोड़ा जनरल सेक्रेटरी नेशनल थेलेसिमिया वेलफेयर सोसाइटी, डॉ संदीप गुप्ता राजीव गाँधी कैंसर इंस्टिट्यूट एंड रिसर्च सेंटर दिल्ली, डॉ वीपी चौधरी एम्स दिल्ली, डॉ योगेश मल्होत्रा सीनियर मैनेजर दतेरी, विक्रांत महाजन प्रधान थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी पानीपत, शिवाली चावला जनरल सेक्रेटरी और साहिल चावला कोषाध्यक्ष ने शिरकत की । उनके साथ सदस्य अभिषेक, दलजीत, पायल, श्वेता, सोनिया, गरिमा एवं संदीप मलिक और शिवांशी, विधियन, आर्व, अभिलक्ष्या एवं योगित भी कैंप का हिस्सा बने । मेहमानों का स्वागत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा और एनएसएस अधिकारी डॉ राकेश गर्ग ने पुष्प-गुच्छ के साथ किया किया । आक के शिविर में लगभग 70 थैलेसीमिया ग्रस्त मरीजों की जांच की गयी और उनसे अन्य मरीजों को जागरूक कराने की शपथ भी दिलाई गयी । एनएसएस स्वयंसेवकों ने म्यूजिकल चेयर और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से समाज को जागरूक करने का कार्य भी किया ।  

     डॉ वीपी चौधरीने कहा कि थैलेसीमिया बच्चों को माता-पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला ब्लड डिसऑर्डर है । इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया बाधित होती है जिसके कारण एनीमिया के लक्षण दिखाई देते हैं । इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद होती है । इसमें रोगी बच्चे के शरीर में खून की भारी कमी होने लगती है जिसके कारण उसे बार-बार बाहर से खून की आवश्यकता पड़ती है । थैलेसीमिया दो प्रकार का होता है । यदि पैदा होने वाले बच्चे के माता-पिता दोनों के जींनस में माइनर थैलेसीमिया होता है तो बच्चे में मेजर थैलेसीमिया हो सकता है जो काफी घातक हो सकता है । किन्तु माता-पिता में से एक में ही माइनर थैलेसीमिया होने पर किसी भी बच्चे को कोई खतरा नहीं होता है । यदि माता-पिता दोनों को माइनर रोग है तब भी बच्चे को यह रोग होने की 25 प्रतिशत संभावना है । अतः यह जरूरी है कि विवाह से पहले महिला-पुरुष दोनों अपने खून का टेस्ट अवश्य कराएं । इस रोग का इलाज़ भी काफी महंगा है परन्तु वर्तमान सरकार महंगे से महंगे इलाज और मशीनों को आमजन तक आसानी से सुलभ कराएगी । ऐसी बिमारी का ग्रस्त कोई भी रोगी उनसे संपर्क कर सकता है ।

            डॉ जेएस अरोड़ा राष्ट्रीय थैलेसीमिया सोसाइटी के जनरल सेक्रेटरी ने कहा कि हम  थैलेसीमिया को नहीं रोक सकते परन्तु आनुवंशिक परीक्षण हम इस बात का पता लगा सकते हा कि हम या हमारे साथी में यह जीन है या नहीं । यदि हम गर्भधारण करने की योजना बना रहे हैं तो इस जानकारी को जानने से आपको अपनी गर्भावस्था की योजना बनाने में मदद मिल सकती है । परिवार नियोजन पर मार्गदर्शन के लिए आनुवंशिक परामर्शदाता से हमें अवश्य बात करनी चाहिए ।

     प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा कि थैलेसीमिया का इलाज करने के लिए मरीज को विशेष दवाएं दी जाती हैं जिनकी मदद से अतिरिक्त आयरन को पेशाब के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है । इसके अलावा मरीज को पौष्टिक आहार एवं अन्य सप्लीमेंट (जैसे फोलिक एसिड) आदि भी दिए जाते हैं ताकि शरीर को स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं बनाने में मदद मिलती है । सरकार द्वारा ऐसे मरीजों को दी जा रही सुविधाओं से वे अत्यंत संतुष्ट है ।

     डॉ राकेश गर्ग एनएसएस अधिकारी ने कहा कि बच्चों के नाख़ून और जीभ पिली पड़ जाने से पीलिया या जौंडिस जैसे लक्ष्ण थैलेसीमिया के होने के लक्ष्ण है । इसके होने पर अकसर बच्चों के जबड़ों और गालों में असामान्यता आ जाती हैं, बच्चों का विकास रूक जाता हैं और वे उम्र से काफी छोटे नजर आते हैं । उनका चेहरा सूखता जाता है, वजन नहीं बढ़ता है और उन्हें सांस लेने में भी तकलीफ होने लगती है । थैलेसीमिया पी‍डि़त के इलाज में बाहरी रक्त चढ़ाने और दवाइयों की अधिक आवश्यकता होती है । इस कारण सभी इसका इलाज नहीं करवा पाते है और आगे चलकर यह बच्चे के जीवन के लिए खतरा साबित होता है । जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है रक्त की जरूरत भी बढ़ती जाती है । हरियाणा सरकार जो कुछ भी इन मरीजों के लिए कर रही है वह काबिले-तारीफ़ है ।

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