Monday, July 20, 2026
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चातुर्मास 29 जुलाई से, संयम और संस्कारों से जुड़ेगा समाज

By LALIT SHARMA , in RELIGIOUS , at July 20, 2026 Tags: , , , ,

चार माह तक एक ही स्थान पर रहकर जनजागरण करेंगे जैन साधु-साध्वी

BOL PANIPAT : 20 जुलाई 2026, जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण साधना काल चातुर्मास इस वर्ष 29 जुलाई से प्रारंभ होगा। वर्षा ऋतु के चार महीनों में जैन साधु-साध्वियाँ एक ही स्थान पर निवास कर आत्मसाधना, स्वाध्याय, प्रवचन, तप, त्याग एवं धर्मप्रभावना के माध्यम से समाज को संयम, सदाचार और नैतिक जीवन का संदेश देंगे। इस अवधि में जैन मंदिरों, स्थानकों एवं उपाश्रयों में धार्मिक आराधनाओं, संस्कारमय कार्यक्रमों तथा आध्यात्मिक गतिविधियों का विशेष वातावरण रहेगा।

श्रमण डॉ. पुष्पेंद्र ने बताया कि जैन आगमों में चातुर्मास का विशेष महत्व बताया गया है। वर्षा ऋतु में असंख्य सूक्ष्म जीव-जंतुओं की उत्पत्ति होती है, इसलिए अहिंसा की भावना को सर्वोपरि रखते हुए जैन साधु-साध्वियाँ इस काल में निरंतर विहार नहीं करते, बल्कि एक ही स्थान पर निवास करते हैं। आगमिक परंपरा के अनुसार वे चातुर्मास के दौरान शहर सीमा से चार कोस (लगभग 10 किलोमीटर) की निर्धारित सीमा से बाहर नहीं जाते। इस वर्ष पक्खी पर्व होने के कारण चातुर्मास का शुभारंभ 29 जुलाई से होगा।

उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल संतों का स्थिर निवास नहीं, बल्कि समाज के आध्यात्मिक जागरण का चार माह का विशेष अभियान है। इस दौरान प्रतिदिन प्रवचन, स्वाध्याय, सामायिक, प्रतिक्रमण, जप, तप, ध्यान, आयंबिल, उपवास, एकासन, पौषध, नवकारसी, भक्ति एवं विभिन्न आराधनाएँ कराई जाती हैं। बड़ी संख्या में श्रद्धालु त्याग, व्रत एवं आत्मसंयम का संकल्प लेकर अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं।

वर्तमान समय में चातुर्मास का महत्व

श्रमण डॉ पुष्पेंद्र ने बताया कि आज का समाज भौतिक सुख-सुविधाओं, तनाव, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्तावाद और मानसिक अशांति से जूझ रहा है। ऐसे समय में चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, अनुशासित और मूल्यनिष्ठ बनाने का अवसर प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि चातुर्मास व्यक्ति को संयम, आत्मनिरीक्षण, अनुशासन, सादगी, पर्यावरण संरक्षण, जीवदया, नैतिकता और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ता है। यह पर्व लोगों को अपनी दिनचर्या सुधारने, क्रोध, लोभ, अहंकार और आसक्ति पर नियंत्रण रखने तथा आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। वर्तमान समय में जब मानसिक तनाव और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है, तब चातुर्मास का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और आवश्यक बन गया है।

सात्विक जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा

चातुर्मास के दौरान सात्विक एवं संतुलित भोजन पर विशेष बल दिया जाता है। गरिष्ठ भोजन का त्याग किया जाता है तथा जमीकंद (आलू, प्याज, लहसुन, अदरक आदि) का उपयोग नहीं किया जाता। अनेक श्रद्धालु बीज, पंचमी, अष्टमी, एकादशी तथा चतुर्दशी जैसे विशेष दिनों में हरी सब्जियों एवं फलों का भी त्याग करते हैं। बाजार में बने खाद्य पदार्थों से भी यथासंभव परहेज किया जाता है। इस अवधि में श्रद्धालु एकासन, उपवास, आयंबिल, पौषध, सामायिक और प्रतिक्रमण जैसी आराधनाएँ करते हैं। आयंबिल में नमक, घी, तेल, मिर्च, मसाले एवं स्वादवर्धक पदार्थों का त्याग कर अत्यंत सादा भोजन ग्रहण किया जाता है, जबकि उपवास के दौरान केवल उबला हुआ जल सूर्य अस्त से पहले ग्रहण किया जाता है।

चातुर्मास के प्रमुख पर्व

चातुर्मास के चार माह धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इस दौरान प्रमुख पर्व इस प्रकार हैं—

* 29 जुलाई – चातुर्मास प्रारंभ
* 8 सितंबर – पर्यूषण महापर्व प्रारंभ (श्वेतांबर)
* 15 सितंबर – संवत्सरी महापर्व एवं दशलक्षण पर्व प्रारंभ (दिगंबर)
* 25 सितंबर – अनंत चतुर्दशी
* ⁠18 अक्टूबर – नवपद आयंबिल ओली प्रारंभ
* 9 नवंबर – भगवान महावीर का 2553वाँ निर्वाण कल्याणक
* 10 नवंबर – गौतम प्रतिपदा एवं वीर निर्वाण संवत् 2553 का शुभारंभ
* 14 नवंबर – ज्ञान पंचमी
* 24 नवंबर – चातुर्मास पूर्णाहुति

इन पर्वों के अतिरिक्त चार माह के दौरान संतों की जन्म जयंती, पुण्यतिथि, धार्मिक संगोष्ठियाँ, संस्कार शिविर, युवा एवं महिला सम्मेलन, सामूहिक आराधनाएँ तथा विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

देशभर में 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियाँ

श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ द्वारा वर्ष 2026 में जारी सूची के अनुसार इस वर्ष श्रमण संघ के आचार्य डॉ शिवमुनि की आज्ञा में 78 साधु चातुर्मास तथा 284 साध्वी चातुर्मास, कुल 362 चातुर्मास निर्धारित हैं। श्रमण संघ में वर्तमान में 214 साधु एवं 961 साध्वियाँ धर्मप्रभावना में सक्रिय हैं।

देश की चारों प्रमुख जैन परंपराओं—स्थानकवासी, मूर्तिपूजक (मंदिरमार्गी), तेरापंथ एवं दिगंबर—को मिलाकर वर्तमान में लगभग 19 हजार से अधिक साधु-साध्वियाँ देशभर में धर्म, शिक्षा, संस्कार, नैतिकता, अहिंसा एवं सामाजिक जागरण का कार्य कर रहे हैं।

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