Saturday, June 27, 2026
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भारत को लीगल फर्स्ट-एड की जरूरत है: अधिवक्ता निखिल चुघ

By LALIT SHARMA , in SOCIAL , at June 27, 2026 Tags: , , ,

BOL PANIPAT , 27 जून 2026। कानूनी जागरूकता के क्षेत्र में लगातार काम कर रहे अधिवक्ता, लेखक एवं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य निखिल चुघ का मानना है कि भारत में अब “लीगल फर्स्ट-एड” की सोच को लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है। उनका कहना है कि जैसे हर व्यक्ति को फर्स्ट-एड की बुनियादी जानकारी होना जरूरी माना जाता है, वैसे ही हर नागरिक को यह भी पता होना चाहिए कि किसी कानूनी परेशानी की शुरुआत में उसे सबसे पहले क्या करना है।

निखिल चुघ ने कहा कि आज बहुत से लोग कानून की कमी से नहीं, बल्कि सही जानकारी की कमी से नुकसान उठाते हैं। कई बार लोग समय पर शिकायत नहीं करते, जरूरी सबूत संभालकर नहीं रखते या गलत सलाह के कारण ऐसे कदम उठा लेते हैं जिनसे बाद में उनका मामला कमजोर हो जाता है।

उन्होंने कहा कि इसी सोच के साथ वे अपने लीगल अवेयरनेस अभियान के जरिए लोगों तक आसान भाषा में कानून की जानकारी पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका उद्देश्य लोगों को कानून की धाराएं याद कराना नहीं, बल्कि उन्हें यह समझाना है कि रोजमर्रा की जिंदगी में अपने अधिकारों की रक्षा कैसे की जाए।

निखिल चुघ के अनुसार “लीगल फर्स्ट-एड” का मतलब हर बात पर कोर्ट जाना नहीं है। इसका मतलब है कि किसी भी कानूनी समस्या की शुरुआत में सही कदम उठाना। चाहे मामला साइबर फ्रॉड का हो, पुलिस से जुड़ा हो, उपभोक्ता अधिकारों का हो या किसी दस्तावेज़ का—अगर शुरुआत सही होगी तो आगे की प्रक्रिया भी आसान हो सकती है।

उन्होंने कहा कि आज सोशल मीडिया पर कानूनी जानकारी तेजी से फैलती है, लेकिन हर जानकारी सही नहीं होती। इसलिए लोगों को बिना जांचे किसी सलाह पर भरोसा करने के बजाय सही स्रोतों से जानकारी लेनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर किसी योग्य वकील से सलाह लेनी चाहिए।

निखिल चुघ ने कहा कि उनका प्रयास किसी मुकदमे को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि ऐसी जागरूकता पैदा करना है जिससे लोग अपने अधिकार समय रहते समझ सकें। उनका मानना है कि अगर हर नागरिक को बुनियादी लीगल फर्स्ट-एड की जानकारी हो, तो कई विवाद शुरू होने से पहले ही संभाले जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि वे आगे भी अपने लेखों, पुस्तकों और जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से इस मिशन पर काम करते रहेंगे। उनका लक्ष्य एक ऐसा समाज बनाने में योगदान देना है, जहां कोई भी व्यक्ति केवल जानकारी के अभाव में अपने अधिकारों से वंचित न रहे।

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