एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की तीन होनहार खिलाडियों के बूते पर कुरुक्षेत्र विश्वविधालय ने झटका नार्थ जोन खो-खो (महिला) चैंपियनशिप में कांस्य पदक
कर्नाटक में आयोजित होने वाली आल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी खो-खो टूर्नामेंट के लिए किया क्वालीफाई
असीमित ऊर्जा, तंदुरुस्ती और कौशल पाने के लिए युवाओं को खो-खो के खेल को अपनाना चाहिए: डॉ अनुपम अरोड़ा
BOL PANIPAT : एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की खिलाडियों अन्नू, निकिता और सोनू के बेहतरीन खेल के दम पर कुरुक्षेत्र विश्वविधालय कुरुक्षेत्र ने न सिर्फ नार्थ जोन खो-खो (महिला) चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता बल्कि 5 से 7 जुलाई तक कर्नाटक में आयोजित होने वाली आल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी खो-खो टूर्नामेंट के लिए क्वालीफाई भी कर लिया है. कुरुक्षेत्र विश्वविधालय की (महिला) खो-खो टीम ने टूर्नामेंट में चौधरी चरणसिंह यूनिवर्सिटी मेरठ को 23-3 के अंतर से और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ को दो पारी के
विशाल अंतर से हराकर कांस्य पदक पर कब्ज़ा किया.
इस जीत में कॉलेज की खो-खो खिलाड़ियों नेशनल मेडलिस्ट अन्नू एवं सोनू तथा खेलों इंडिया की टीम में शामिल नेशनल मेडलिस्ट निकिता का योगदान शानदार रहा. विजेता खिलाडयों का कॉलेज प्रांगण में आगमन पर स्वागत प्रधान पवन गोयल, प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, शारीरिक शिक्षा विभागाध्यक्ष डॉ सुशीला बेनीवाल, डॉ एसके वर्मा, प्रो रजनी, ग्राउंड्स मैन प्रताप और अन्य प्राध्यापको ने किया. कॉलेज की छात्रा खिलाडियों निकिता, अन्नू और सोनू ने बुद्धिमानी, कौशल और तेज गति के समन्वय से शानदार खेल दिखाकर सभी टीमों पर दबदबा बनाकर रखा. विदित रहे की उत्कृष्ठ प्रदर्शन के आधार पर ही इन तीनों छात्राओं का चयन आल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी खो-खो (महिला) टूर्नामेंट के लिए हुआ था.
प्रधान पवन गोयल ने अपने बधाई सन्देश में कहा की कॉलेज के खिलाडियों ने नियमित जीत के परचम लहरा रखे है जिस पर उन्हें गर्व है. खिलाडियों को कॉलेज प्रशासन इसी प्रकार से सुविधाएं देता रहेगा ताकि वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित कर सके. खो-खो को खेलने से पूरा शरीर तंदुरुस्त रहता है और साथ ही हमारी सोचने-समझने की शक्ति भी बढ़ती है. इस खेल को खेलने के बाद एकाग्रता में भी
वृद्धि होती है जो हमारे अध्यन में मददगार है.
प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा ने कहा की खो-खो के खेल में किसी प्रकार की अन्य वस्तुओं की आवश्यकता नहीं पड़ती है इसलिए सभी वर्ग के छात्र-छात्राएं इस खेल में भाग ले सकते है. यह भारत का सबसे पुराना और ख़ास तौर पर ग्रामीण इलाकों में बहुत लोकप्रिय खेल है. खो-खो का खेल खुले मैदान में खेला जाता है जिससे हमारा शरीर चुस्त और तंदुरुस्त बना रहता है. इस खेल को खेलने के बाद हमारे शरीर में किसी भी प्रकार
का आलस्य नहीं रहता है. यदि हम भरपूर ऊर्जा, तंदुरुस्ती और कौशल खुद में पैदा करना चाहते है तो खो-खो इसके लिए सबसे उचित खेल है.
डॉ सुशीला बेनीवाल शारीरिक शिक्षा विभागाध्यक्ष ने कहा की भारत देश विभिन्न परंपरागत खेलों को खेले जाने के लिए सदा विख्यात रहा है और हमारे परंपरागत खेल ऐसे है जिनमें किसी भी प्रकार की धनराशि और साजो-सामान की जरूरत नहीं होती है. इसे हर वर्ग के बच्चे खेल सकते है. कंप्यूटर और मोबाइल की वजह से बच्चे ऐसे खेलों में कम रूचि ले रहे है और इसी कारण उनका विकास रुक रहा है और मांसपेशियां मजबूत नहीं हो पा रही है. बीमारियों का पनपना भी इसीलिए संभव है की हम अब खेलने से बचने लगे है. लोगों और अभिभावकों को भी इस बात को समझना चाहिए कि हमारे जीवन में खेलों का कितना बड़ा महत्व है. हमारे देश में मुख्य रूप से हॉकी, कबड्डी और खो-खो खेले जाते है. ये सारे खेल ऐसे है जिनसे हमारा पूर्ण शारीरिक
विकास होता है. खो-खो खेलने से हमारा स्वभाव कभी भी चिड़चिड़ेपन का शिकार नहीं होता है.

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