एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर सेमीनार और विविध कार्यक्रमों का आयोजन
-मानसिक स्वास्थ्य का सीधा असर हमारे कार्यों और रिश्तों पर पड़ता है: डॉ मोना नागपाल मनोरोग चिकित्सिक सिविल हस्पताल पानीपत
BOL PANIPAT , 10 अक्टूबर, एसडी पीजी कॉलेज पानीपत की एनएसएस इकाइयों, जिला मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम सिविल हस्पताल पानीपत, ईशा फाउंडेशन और कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वाधान में ‘वर्ल्ड मेन्टल हेल्थ डे’ के अवसर पर सेमिनार और विविध प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में जिला मानसिक स्वास्थ्य प्रोग्राम सिविल हस्पताल पानीपत से डॉ मोना नागपाल मनोरोग चिकित्सक, डॉ अमित, रवि कुमार मनोवैज्ञानिक, विनोद कुमार मनोरोग सामाजिक कार्यकर्ता, संगीता कम्युनिटी नर्स एवं पूनम मनोचिकित्सक नर्स और ईशा फाउंडेशन से ईशा कार्यकर्ता निधि गोयल, ज्योति भारद्वाज, आरुषी चुग और उत्कर्ष वर्मा ने कार्यक्रम में शिरकत की और विद्यार्थियों को मेंटल हेल्थ, नाडी शुद्धि प्राणायाम, ईशा क्रिया और विभिन्न योग मुद्राओं के बारे में व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया. मेहमानों का स्वागत प्राचार्य डॉ अनुपम अरोड़ा, एनएसएस अधिकारी डॉ राकेश गर्ग, डॉ संतोष कुमारी और डॉ महाश्वेता मुखर्जी ने किया. इस अवसर पर एनएसएस सेल और मनोविज्ञान विभाग के तत्वाधान में पोस्टर मेकिंग, स्लोगन लेखन और रंगोली प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया जिसमे छात्र-छात्राओं और एनएसएस स्वयंसेवकों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और मेंटल हेल्थ के विभिन्न विषयों पर अपनी प्रतिभा मनवाई.

डॉ मोना नागपाल ने कहा कि अगर हम मानसिक रूप से स्वस्थ्य नहीं हैं तो यह हमारे काम से लेकर हमारे रिश्तों पर असर डालता है. फिर भी लोग अपने मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते है. दिमाग भी हमारे शरीर का एक हिस्सा है और इसमें भी कोई बीमारी हो सकती है. इस स्थिति को हमें बहुत गंभीरता के साथ लेना चाहिए. वर्तमान की भाग-दौड़ और भौतिकवादी जीवन प्रणाली ने हर इंसान को अवसाद और तनाव से भरपूर जीवन जीने को मजबूर कर दिया है. इसका सबसे बुरा असर हमारे मष्तिष्क पर पड़ता है. हमें कभी खुद से दुखी या नाराज़ नहीं होना चाहिए बल्कि खुद के साथ प्यार से पेश आना चाहिए. हमें प्रत्येक दिन कम से कम 15 से 20 मिनट अपने लिए निकालने चाहिए. अपने लिए समय निकालना भी सेल्फ केअर का अटूट हिस्सा है. जीवन में हमें सक्रीय, सकारात्मक और खुद के प्रति संवेदनशील होना चाहिए.
आरुषी चुघ ने कहा कि ईशा फाउंडेशन सदगुरु द्वारा स्थापित एक गैर लाभकारी समाजसेवी संगठन है जिसे इसके स्वयंसेवक चलाते हैं. संगठन इंसानी खुशहाली के सभी पहलुओं पर ध्यान देता है और पूरे संसार में 300 केन्द्रों एवं 7 करोड़ स्वयंसेवकों के समर्थन के साथ मानव खुशहाली के सभी आयामों को संबोधित करती है. अपने भीतरी रूपांतरण के शक्तिशाली योग कार्यक्रमों से लेकर समाज, पर्यावरण और शिक्षा के लिए अपनी प्रेरणादायक परियोजनाओं तक ईशा की गतिविधियों को एक समावेशी संस्कृति बनाने के लिए तैयार किया गया है जो वैश्विक सद्भाव और प्रगति का आधार है. ईशा फाउंडेशन की गतिविधियों ने हर तरह की आर्थिक, सांस्कृतिक या धार्मिक पृष्ठभूमि वाले दो सौ मिलियन से ज्यादा लोगों तक अपनी पहुँच बनाई है. फाउंडेशन की सामाजिक परियोजनाएँ इस तरह तैयार की गई हैं कि वे आसानी से और बड़े पैमाने पर संचालित की जा सकें.

उत्कर्ष वर्मा ईशा कार्यकर्ता ने नाड़ी शुद्धि और ईशा क्रिया सहित कई सरल योग अभ्यास छात्र-छात्राओं को सिखाए. उन्होनें मानवीय जीवन के स्वास्थ्य, शांति, प्रेम, सफलता, आनंद, आंतरिक खोज और खुशहाली जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर तैयार किए गए योग के अभ्यासों का प्रशिक्षण दिया. उन्होनें कहा कि प्रत्येक अभ्यास केवल 5 मिनट में किया जा सकता है और इसे 7 साल से अधिक उम्र का कोई भी व्यक्ति कर सकता है. नियमित रूप से योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति का उत्साह, ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और स्मरण शक्ति बढ़ती हैं. इन क्रियाओं को करने से शरीर, मन और भावनाओं में स्थिरता भी आती है. पीठ दर्द, तनाव, थकान और चिंता जैसी समस्याओं का निदान भी इनसे होता है. उन्होंने छात्रों को जीवन में सकारात्मक सोच रखते हुए आगे बढ़ने की सलाह दी. तभी वे देश के जिम्मेदार नागरिक बनकर राष्ट्रीय निर्माण में अपना योगदान दे पायेंगे.
कॉलेज प्राचार्य डॉ. अनुपम अरोड़ा ने बताया कि अक्सर माता-पिता या अपने अध्यापकों की डांट के बाद युवा गुमसुम हो जाते है या फिर उनका स्वभाव गुस्सैल और चिड़चिड़ा हो जाता है. गुमसुम रहने वाले नवयुवक या तो अवसाद का शिकार हो जाते है या फिर आत्महत्या जैसे कदम उठाने के बारे में सोचने लगते है. बाद में मनोचिकित्सक काउंसलिंग में पता चलता है कि वे अपने अभिभावकों या शिक्षकों की डांट से खुद को बेइज्जत या छोटा महसूस करने लगे थे. युवाओं को चाहिए कि वे अपने मन को मजबूत बनाए. हमें किसी भी मानसिक रोगी से सकारात्मक बात करके उसकी सोच को जगाना चाहिए. यदि हमारे आस-पास कोई व्यक्ति या कर्मचारी मानसिक तनाव से गुजर रहा है तो हमें उसकी पारिवारिक या अन्य समस्याएं जानकर उससे मित्रवत बात करनी चाहिए और उसका हौंसला बढ़ाना चाहिए.
पोस्टर मेकिंग प्रतियोगिता के परिणाम-
प्रथम साहिल बीए-प्रथम
द्वितीय मोहित बीए-प्रथम
तृतीय अन्नू बीए-प्रथम (अंग्रेजी आनर्स)
सांत्वना मोहिनी बीए-द्वितीय
स्लोगन लेखन प्रतियोगिता के परिणाम-
प्रथम महक बीए-तृतीय (अंग्रेजी आनर्स)
द्वितीय इशिका जैन बीए-प्रथम (अंग्रेजी आनर्स)
रंगोली प्रतियोगिता के परिणाम-
प्रथम तनिषा और रिंकी
द्वितीय पूजा और नेहा
तृतीय अंजलि और साक्षी
इस अवसर पर डॉ एसके वर्मा, डॉ जुगमती, प्रो कविता, प्रो मनोज कुमार, दीपक मित्तल, चिराग सिंगला आदि उपस्थित रहे .

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