हरियाणा की प्रसिद्ध नृत्यांगना टीशा शर्मा ने निर्मला देशपांडे संस्थान में छात्रों को लोक नृत्यों की दी दीक्षा
BOL PANIPAT : चंडीगढ़, 8 अक्टूबर 2025:सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत रखने और युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के उद्देश्य से हरियाणा की प्रसिद्ध नृत्यांगना टीशा शर्मा ने हाल ही में निर्मला देशपांडे संस्थान पहुंचकर छात्रों को भारतीय एवं हरियाणा के पारंपरिक लोक नृत्यों की बारीकियां सिखाईं। इस विशेष कार्यशाला में उन्होंने न केवल नृत्य कला के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डाला, बल्कि इन नृत्यों के सांस्कृतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की। संस्थान की निदेशक पूजा सैनी सहित अन्य शिक्षकों और कर्मचारियों ने उनका हार्दिक स्वागत किया, जबकि उनकी सहयोगी अंजलि भी पूरे कार्यक्रम में उपस्थित रहीं।
निर्मला देशपांडे संस्थान, जो चंडीगढ़ क्षेत्र में शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है, ने इस आयोजन को अपनी वार्षिक सांस्कृतिक श्रृंखला का हिस्सा बनाया है। संस्थान की निदेशक पूजा सैनी ने बताया, “टीशा शर्मा जैसी कलाकार को हमारे छात्रों के बीच लाना एक सौभाग्यपूर्ण अवसर है। हरियाणा के लोक नृत्य न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि वे हमारी मिट्टी की सुगंध को संजोए हुए हैं। इस कार्यशाला से छात्रों को अपनी विरासत से जोड़ने का मौका मिला है।” सैनी ने आगे कहा कि संस्थान भविष्य में भी ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहन देगा ताकि छात्र आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों को भी आत्मसात कर सकें।
कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन से हुआ, जिसमें टीशा शर्मा का स्वागत फूलों की मालाओं और हरियाणवी लोक गीतों से किया गया। लगभग 150 छात्रों ने इस सत्र में भाग लिया, जो कक्षा 6वीं से 12वीं तक के थे। टीशा शर्मा, जो हरियाणा के सांस्कृतिक मंचों पर अपनी ऊर्जावान प्रस्तुतियों के लिए विख्यात हैं, ने सबसे पहले छात्रों को भारतीय लोक नृत्यों का एक संक्षिप्त अवलोकन दिया। उन्होंने रासलीला, गरबा और भांगड़ा जैसे नृत्यों का उल्लेख किया, लेकिन विशेष रूप से हरियाणा के लोक नृत्यों पर जोर दिया। “हरियाणा का लोक नृत्य केवल कदमों का खेल नहीं है, बल्कि यह हमारी कृषि-आधारित संस्कृति का प्रतिबिंब है,” टीशा ने कहा। उन्होंने बताया कि फसल कटाई के उत्सवों में किए जाने वाले झूमर, खोर और सांग नृत्य किस प्रकार सामुदायिक एकता और खुशी को दर्शाते हैं।
कार्यशाला के व्यावहारिक भाग में टीशा शर्मा ने छात्रों को हाथों से पकड़कर नृत्य सिखाया। उन्होंने सबसे पहले झूमर नृत्य की मूल मुद्राओं पर ध्यान केंद्रित किया, जो हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं द्वारा किया जाता है। छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया, और जल्द ही कमरा ठुमकों और तालियों की गूंज से भर गया। एक छात्रा ने बताया, “मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि नृत्य इतना सरल और मजेदार हो सकता है। टीशा मैम ने हमें बताया कि ये नृत्य तनाव दूर करने और आत्मविश्वास बढ़ाने में कैसे मदद करते हैं।” इसी तरह, एक लड़के ने कहा, “हरियाणा के नृत्य पुरुषों को भी सिखाते हैं कि भावनाओं को कैसे व्यक्त किया जाए। यह हमारे लिए नया अनुभव था।”
टीशा शर्मा ने नृत्यों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज के डिजिटल युग में लोक कला को भूलना हमारी पहचान को मिटाने जैसा है। “भारतीय लोक नृत्य विविधता में एकता का प्रतीक हैं। हरियाणा के नृत्य जैसे फाग और होली के दौरान किए जाने वाले रास विशेष रूप से सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा देते हैं। ये नृत्य पर्यावरण संरक्षण, लैंगिक समानता और सामुदायिक सहयोग जैसे मूल्यों को सिखाते हैं।” उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वे इन नृत्यों को अपने दैनिक जीवन में शामिल करें, ताकि सांस्कृतिक विरासत जीवित रहे। उनकी सहयोगी अंजलि, जो स्वयं एक प्रशिक्षित नृत्य शिक्षिका हैं, ने संगीत वाद्यों जैसे ढोलक और चुटकी पर साथ दिया, जिससे सत्र और जीवंत हो गया। अंजलि ने बताया, “टीशा के साथ काम करना हमेशा प्रेरणादायक होता है। हमारा उद्देश्य है कि ये कला रूप नई पीढ़ी तक पहुंचें।”
कार्यक्रम के अंत में छात्रों ने एक संयुक्त प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने सीखे गए नृत्यों का मिश्रण प्रस्तुत किया। संस्थान के प्राचार्य ने टीशा शर्मा को स्मृति चिन्ह भेंट किया, जबकि छात्रों ने उन्हें धन्यवाद ज्ञापित किया। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक जागरूकता बढ़ाने में सफल रहा, बल्कि छात्रों में रचनात्मकता और आत्मविश्वास को भी प्रज्वलित करने का काम किया।
निर्मला देशपांडे संस्थान, जो स्वर्गीय निर्मला देशपांडे की स्मृति में स्थापित है, शिक्षा के साथ-साथ कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। पिछले वर्षों में यहां विभिन्न कार्यशालाएं आयोजित की गई हैं, जिनमें संगीत, चित्रकला और नाटक शामिल हैं। टीशा शर्मा, जिन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर कई पुरस्कार जीते हैं, अब हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में नृत्य प्रशिक्षण शिविर चला रही हैं। उनका यह दौरा संस्थान के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ है।
भविष्य में संस्थान ऐसी और गतिविधियों की योजना बना रहा है, ताकि छात्र वैश्विक पटल पर अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत कर सकें। यह कार्यक्रम साबित करता है कि शिक्षा का असली मकसद केवल किताबी ज्ञान ही नहीं, बल्कि समग्र विकास है।

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