Sunday, April 19, 2026
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मनुष्य शरीर से ही जन्म मरण से मुक्ति सम्भव है।

By LALIT SHARMA , in RELIGIOUS , at December 11, 2024 Tags: , , , ,

BOL PANIPAT : श्री प्रेम मंदिर पानीपत में श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के अन्तर्गत बुधवार को पांचवां दिन रहा।  कथा प्रारम्भ करते हुए पावन वृंदावन से पधारे कथा व्यास श्रद्धेय श्री हित शरण अतुल कृष्ण शास्त्री जी ने कहा कि  महाभारत  युद्ध के आरम्भ होने से पहले जब अर्जुन ने मोह वश अपने सगे-संबंधियों से युद्ध नहीं करने और शस्त्र रख बैठ गये तो भगवान कृष्ण जो अर्जुन के सारथी बने हूए थे अर्जुन की कायरता को दूर करने हेतु जो उपदेश दिया वही गीता उपदेश रूप में वर्तमान में भी पूरी मानवता के कल्याण हेतु उतना ही सार्थक है जितना द्वापर में रहा।
        कौरव धर्म के आचरण का अनुसरण की सत्यता को स्वीकार नहीं कर रहे उधर पांडव युद्ध नहीं चाहते थे केवल धर्म मार्ग पर चलते हुए कौरवों से अपना हक मांग रहे थे। गोबिंद भी जब कौरवों को समझने में असफल हो गये तो युद्ध अवश्यंभावी हो गया। युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन के मोह को नष्ट करने हेतु भगवान ने कहा कि यंहा जो भी जन्मा है उसे मरना भी अवश्य है। मरता यह पांच तत्वों द्वारा निर्मित शरीर है। जीवात्मा अजर अमर अविनाशी है। मृत्यु आदि से परे है।
यह संसार मेरी प्रकृति द्वारा निर्मित है। सभी प्राणी मेरी प्रकृति के आधीन हैं। केवल मनुष्य शरीर ही कर्म करने में स्वतंत्र है लेकिन वांछित फल का मिलना न मिलना का लेखा-जोखा मेरे पास है। मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शुद्ध बुद्ध और आनंद मय है। लेकिन यह मेरी त्रिगुणी माया याने सतो रजो तमो गुणों से प्रभावित होकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूले हुए है। अर्जुन तुम मेरे प्रिय सखा हो इसलिए तुम्हें मेरी आज्ञा मानकर युद्ध करना होगा। भगवान ने यह भी कहा कि अर्जुन जिन्हें तुम मोह वश मारना नहीं चाहते फिर भी मृत्यु को प्राप्त होने हैं। धर्मानुसार इन्हें मारने से तुम्हें पाप नहीं लगेगा।  तुम सब कुछ मेरे अर्पण कर। समर्पण भाव मेरी आज्ञा पर चल।  योग क्षेम को भी मेरे अर्पण कर। मृत्यु की कायरता दूर करने हेतु गोबिंद ने अपना विराट स्वरूप भी दिखाया। अंत में अधर्म पर धर्म की विजय हुई।
   पांडवों ने विवेक से काम लिया और गोबिंद के दिये दिशा निर्देशों पर चलते हुए सभी खोई सम्पत्ति प्राप्त की। दुर्योधन कुमति याने अधर्म मार्ग पर चला और अपनी सभी सम्पत्ति खो बैठा। अपने अंहकार में इतना डूबा कि गोबिंद को भी भगवान कहने को नकारता रहा।
     आज परिवारों में अधिकांश परस्पर वैर भाव ईर्ष्या और द्वेष अधिक है। उदारता त्याग सेवा जिसकी आज भी नितांत आवश्यकता है देखने में बहुत कम लगती है।

 परम पूज्या श्री श्री 108 श्री कान्ता देवी जी महाराज व परमाध्यक्षा प्रेम मंदिर पानीपत की अध्यक्षता में श्री प्रेम मंदिर पानीपत में पावन दिव्य श्री मद्भागवत कथा प्रारम्भ हुई। उन्होंने कहा कि यह दिव्य कथा सम्पूर्ण मानवता के कल्याण हेतु है। पावन गीता के दर्शाए मार्ग पर चलते हुए ही हम अपना कल्याण कर सकते हैं। वर्तमान में यदि हर घर में पांडव जैसे पुत्र हों, शान्ति  प्रेम भक्ति का मार्ग प्रशस्त हो तो आवश्यक है कि कथाएं जो हम श्रवण करते हैं उनका सकारात्मक अनुसरण भी करें।
       परमाध्यक्षा ने भी अपने उपदेश संदेश में बताया कि पावन कथा श्रवण करने व अनुसरण करने से ही परस्पर प्रेम सहजता और प्रसन्नता का संचार होंना सम्भव है।
     सत्संग में स्थानीय संगत के अलावा हल्द्वानी, कानपुर, झज्जर , रोहतक जीरकपुर, बहादुर गढ, दिल्ली, सहारनपुर सोनीपत आदि से भी बहुत संख्या में श्रद्धालु जन उपस्थित रहे।

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