भक्त को दुःख में देख भगवान भी दुखी होते हैं।
BOL PANIPAT : श्री प्रेम मंदिर पानीपत में श्री मद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह के अन्तर्गत मंगलवार को चौथा दिन रहा। कथा प्रारम्भ करते हुए पावन वृंदावन से पधारे कथा व्यास श्रद्धेय श्री हित शरण अतुल कृष्ण शास्त्री जी ने कहा कि महाभारत का युद्ध समाप्त होने के पश्चात प्रस्थान करने से पूर्व अपना वायदा निभाते हेतु भगवान कृष्ण भीष्म पितामह को उनके अन्तिम समय में मिलना नहीं भूले। दोनों में पांडवों की धर्म प्रणायता और कौरवों का अधर्म आचरण पर परस्पर मार्मिक संवाद हुआ। भीष्म पितामह का अंतिम समय देख गोबिंद भी अश्रुपात करने लगे और ईश्वरीय रूप में दर्शन दिए। कुंती बुआ से जिस समय विदाई लेने गए उस समय भी दोनों में हृदय विदारक दृश्य दिखाई दिया। कुंती ने गोबिंद को भगवान कहकर सम्बोधित किया तो कृष्ण बहुत भावूक हो
गए। उद्धव जी को भी ठाकुर विदा होने से पूर्व मिले और अपना नाम दिया।
त्रेता युग में भी जब सीता जी रावण द्वारा हरण किये जाने विलाप करती जा रही थीं तो गिद्ध राज जटायु ने रावण को चुनौती दी और लड़ते हुए पंख कटे जाने से गम्भीर रूप से घायल हो गए। भगवान राम सीता जी की खोज करते हुए मार्ग में जटायु से मिले। गिद्ध राज ने रावण संग लड़ाई की आप बीती सारी बात बताई।
भगवान राम जटायु को गोद में लेकर उनकी करनी के प्रति कृतज्ञता करने लगे। जटायु के गोलोक गमन करने पर राम जी के भी अश्रुपात हुए। जटायु ने नारी रक्षा करने हेतु अपने आयु और निर्बल शरीर की परवाह न करते हुए अपने से बलशाली रावण से युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो जीने को सार्थक कर गये। इसलिए भी राम जी के नयनों से अश्रुपात हुआ।

यह जीवन परमार्थ के लिए ही मिला है। मनुष्य के अलावा जितनी सभी योनियां हैं सभी प्रकृति के अधीन हैं। लेकिन मनुष्य ऐसा प्राणी है जो प्रकृति के आधीन तो है लेकिन कर्म करने मे स्वतंत्र है। ईश्वर ने मनुष्य को सेवा कार्यों में व्यस्त रहने ईश्वर भजन और अपना भला सोचते हुए कल्याण करने का मार्ग प्रशस्त करने हेतु विवेक दिया है। पांडवों ने विवेक से काम लिया और गोबिंद के दिये दिशा निर्देशों पर चलते हुए सभी खोई सम्पत्ति प्राप्त की। दुर्योधन कुमति याने अधर्म मार्ग पर चला और अपनी सभी सम्पत्ति खो बैठा। अपने अंहकार में इतना डूबा कि गोबिंद को भी भगवान मानने को नकारता रहा। वर्तमान में यही हो रहा है। दुर्योधन सैकड़ों सैकड़ों में मिल जायेंगे लेकिन पांडव गिनती के ही मिलेंगे। आज परिवारों में अधिकांश परस्पर वैर भाव ईर्ष्या और द्वेष अधिक है। उदारता त्याग सेवा बहुत कम है।
परम पूज्या श्री श्री 108 श्री कान्ता देवी जी महाराज व परमाध्यक्षा प्रेम मंदिर पानीपत की अध्यक्षता में श्री प्रेम मंदिर पानीपत में पावन दिव्य श्री मद्भागवत कथा प्रारम्भ हुई। उन्होंने कहा कि यह दिव्य कथा सम्पूर्ण मानवता के कल्याण हेतु है। वर्तमान में यदि हर घर में पांडव जैसे पुत्र हों, शान्ति प्रेम भक्ति का मार्ग प्रशस्त हो तो आवश्यक है कि कथाएं जो हम श्रवण करते हैं उनका सकारात्मक अनुसरण भी करें।
परमाध्यक्षा ने भी अपने उपदेश संदेश में बताया कि पावन कथा श्रवण करने व अनुसरण करने से ही परस्पर प्रेम सहजता और प्रसन्नता का संचार होंना सम्भव है।
श्री प्रेम मंदिर अम्बाला से पधारीं परमाध्यक्षा परम पूज्या परम श्रद्धेया श्री श्री गीता बहन जी ने भी अपने पावन प्रवचनों में फरमाया कि कथा श्रवण करने के पश्चात उसे जीवन में अनुसरण करना भी नितांत आवश्यक है
सत्संग में हल्द्वानी, कानपुर, जीरकपुर, बहादुर गढ, दिल्ली, सहारनपुर सोनीपत आदि से भी बहुत संख्या में श्रद्धालु जन उपस्थित रहे।

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