Wednesday, September 16, 2026
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-रमजान के चौथे जुमे पर मौलाना ने मां-बाप की खिदमत को लेकर दिये बयां पर आंखों से आंसू नहीं रोक पाए नमाजी

By LALIT SHARMA , in RELIGIOUS , at April 14, 2023 Tags: , , ,

‘मां-बाप की नाफरमानी करना सबसे बड़ा गुनाह’ मां बुलाए तो नमाज तोड़ कर दो जवाब
-कोरोना पर एतिहात नमाजियों को सैनेटाइज के बाद मिली एंट्री

BOL PANIPAT । अप्रैल की भीषण गर्मी और रमजान में रोजेदारों की इबादत का अनोखा मेल चल रहा है। रमजान का आज चौथा जुम था और २२वां रोजा। नमाज पढऩे वालों की तादाद के सामने मस्जिदों के इंतजाम कम पड़ते दिख रहे थे। या यू कहे कि मस्ज्दि में पांव रखने तक की जगह नहीं थी। नमाज के बाद लोगों ने जमकर खरीददारी की। जुम्मे की नमाज से पहले लोगों को जकात, फितरा, सदका आदि के बारे में विस्तार से बताया गया। वहीं, माडल टाउन की ईदगाह में मौलाना सादिक साहब ने मां-बाप की इज्जत को लेकर इस्लाम और कुरान में कया तव्वजों दी गई, उसके बारे में बयां किया। मौलाना सादिक ने फरमाया कि अल्लाह ने पूरी दुनिया में इंसान को सबसे बेहतरीन मखलूक बनाया है। इंसान के दुनिया में आने का जरिया उसके मां-बाप होते हैं। इसलिए इस्लाम में अपने मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करने को कहा गया है। किसी भी इंसान के लिए उसके मां-बाप उसकी सबसे बड़ी दौलत हैं। कहा जाता है कि जिस तरह से इंसान अपने मां-बाप की खिदमत करेगा उसी तरह से उसके बच्चे भी करेंगे। कुरान में जिक्र है कि तुम अल्लाह ताला की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ और अपने मां-बाप के साथ अच्छा सलूक करो। इस्लाम में मां-बाप का दर्जा इतना ऊंचा है कि अगर अल्लाह को एक मानने और इबादत करने के बाद मां-बाप की खिदमत करने को कहा गया है। इसकी वजह यह है कि जहां इन्सान का वजूद हकीकत में अल्लाह की तरफ से है तो वहीं जाहिरी वजूद मां-बाप की वजह से है। इससे पता चलता है कि शिर्क के बाद अगर कोई गुनाह सबसे बड़ा है तो वह मां.बाप की नाफरमानी करना है। इस्लाम में मां-बाप की नाफरमानी के अलावा उनके साथ नाराजगी का इजहार और उन्हें झिडक़ने से मना किया गया है। उनके साथ अदब के साथ नरम लहजे में बातचीत करने को कहा गया है। हदीस का जिक्र करते हुए मौलाना ने बताया कि हजरत बिन मसूद कहते हैं कि मैंने मोहम्मद स0 से पूछा कि अल्लाह को कौन सा काम सबसे ज्यादा पसंद है। आप ने फरमाया नमाज को उसके वक्त पर अदा करना। हजरत अबदुल्लाह रजि0 कहते हैं मैंने पूछा इसके बाद कौन सा अमल अल्लाह को ज्यादा पसंद है, तो आप ने फरमाया मां-बाप की फरमाबरदारी।

रमजान में जुमे की अहमियत

जुमे का दिन इस्लाम में बहुत ही खास माना जाता है यहीं वजह है कि इस दिन नमाज अदा करने का महत्व भी बढ़ जाता है। हदीस शरीफ में बताया गया है कि जुमे के दिन ही हजरत आदम अलैहिस्सलम को जन्नत से दुनिया में भेजा गया था और जुमे को ही उन्होंने जन्नत में वापसी की थी। जुमे की नमाज अदा करने से पिछले हफ्ते के पापों से मुक्ति मिलती

रमजान का इस्लाम में महत्व

इस्लाम के बुनियादी स्तंभों में रमजान एक स्तंभ है। रमजान महीने की २७वीं रात शब.ए.कद्र को कुरआन का अवतरण हुआ था। रमजान में तरावीह की नमाज पढऩे, कुरआन पढऩे, मुल्क की उन्नति व भाईचारे के लिए दुआ करने, दान देने और धार्मिक काम करने का बहुत महत्व है। रोजा न रखने में बीमार और यात्रा करने वालों को छूट दी गई है। इसके अलावा जरूरी है कि वह बुद्धिमान और बालिग हो। अल्पायु न हो, मानसिक रूप से विकृत न हो। तीसरा रोजा रखने की क्षमता रखता हो, जिसका आशय है व्यक्ति बीमार न हो। चौथा वह यात्रा पर न निकला हो। पांचवां परेशानियों से दूर हो। मासिक धर्म वाली औरतों के लिए भी रोजा की अनिवार्यता नहीं रखी गई है। रमजान प्रत्येक मुसलमान को विलासितापूर्ण जीवन से दूर होने का संदेश देता है।
यह महीना वर्ष भर का मार्ग दर्शक महीना है
रमजान कहता है भूखे, प्यासे, बीमार, लाचार, जरूरतमंद व्यक्तियों की मदद करो। रमजान लोभ, लालच, अहंकार, मदिरापान, व्यभिचार, मूर्तिपूजा, अंधविश्वास आदि को जीवन में धारण न करने और अहिंसा, करुणा, शिक्षा को जीवन में धारण करने की सीख देता है। यह महीना वर्ष भर का मार्ग दर्शक महीना है। प्यास, भूख, गर्मी आदि की परवाह न करना इस महीने की अहमियत को दर्शाता है। रोजा हमें इच्छाओं पर काबू पाना सिखाता है।  

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